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संग्रहणी रोग के कारण लक्षण और घरेलू उपचार

संग्रहणी रोग के कारण लक्षण और घरेलू उपचार – What is Collectible disease in Hindi

संग्रहणी रोग को श्वेतातिसार रोग या स्प्रू रोग भी कहते हैं, अंग्रेजी में इस रोग का नाम Collectible disease है । संग्रहणी  रोग में मरीज को  सुबह बिना किसी दर्द के हल्का और फेन दार खडि़या (मिट्टी के) रंग का पानी के समान पतला दस्त आता है। जैसे-जैसे रोग बढ़ता  है वैसे-वैसे सायंकाल भी भोजन के बाद तुरंत दस्त भी आने लगता है। लेकिन इससे  रोगी को तुरंत कोई कष्ट महसूस नही होता है, इसके बाद पेट फूलना और  बद हजमी आदि जैसे लक्षण उत्पन्न होने लगते  हैं। इससे मरीज बहुत कमजोर भी हो जाता है । आज हम जानते हैं कि संग्रहणी रोग के कारण लक्षण और घरेलू  उपचार – What is Collectible disease in Hindi . 

संग्रहणी रोग (Collectible disease) के कारण

हम लोगों का  जीवन इतना व्यस्त हो गया है कि हमारे पास  स्वयं के लिए भी समय नहीं रह गया है। इसी वजह से लोग पोषण रहित फास्टफूड का सेवन कर पेट तो भर लेते हैं, किंतु यह नहीं समझते कि इससे स्वास्थ्य की कितनी हानि हो रही है। ऐसे पदार्थों के नियमित सेवन से धीरे-धीरे पाचक अग्नि विकृत हो जाती है, जो अधिकांश रोगों का मूल कारण बनती है । संग्रहणी रोग पाचन संस्थानगत रोगों में प्रमुख रोग है । पाचन संस्थान के अन्य रोगों के समान इस रोग का प्रधान कारण भी मंदाग्नि है । मुख से लेकर गुदा तक पाचन प्रणाली के सारे अवयव इस रोग में विकृत हो जाते हैं, किंतु प्रधान रूप से ग्रहणी की विकृति से ही यह रोग होता है ।

संग्रहणी पाचक अग्नि का प्रधान केंद्र है। संग्रहणी शब्द से छोटी आंत का प्रारंभिक भाग या केवल छोटी आंत का ही अर्थ लेना चाहिए। आंत के इस भाग में ही मुख्य रूप से आहार का पाचन होता है। इसी स्थान पर लिवर द्वारा स्रवित पित्त एवं आन्याशय द्वारा स्त्रवित अग्न्यायिक रस आहार के साथ मिलकर उसका पाचन करते हैं। वसा के पाचन का भी यही प्रधान केंद्र है। संग्रहणी का सामान्य कार्य पाचन के लिए अनपचे अन्न का धारण करना एवं पाचन के बाद बचे हुए अंश को आंत में आगे की ओर सरका देना है।  (संग्रहणी रोग के कारण लक्षण और घरेलू उपचार)

संग्रहणी का यह कार्य अग्नि के बल पर निर्भर है । प्रारंभ से ही जिनकी अग्नि मंद हो या अतिसार के कारण जिनकी अग्नि मंद हो गई हो, ऐसे व्यक्ति यदि अपथ्य का सेवन करते हैं, तो उनकी अग्नि पुनः अधिक मंद एवं विकृत होकर संग्रहणी को भी दूषित कर आहार को कभी अर्धपक्वावस्था में, कभी पक्वावस्था में अनेक बार त्यागती है। इससे मल दुर्गन्धित, कभी बंधा, कभी तरल, अनेक बार पीड़ा के साथ निकलता है । यह ग्लूकोज वसा तथा विटामिन के अवशोषण में अवरोध उत्पन्न हो जाने से होने वाला रोग है ।

संग्रहणी  रोग में आंत की श्लेष्मिक कला में सूजन आ जाने से अधिक स्राव होने लगता है, जिससे पाचक रस आहार पर सम्यक क्रिया नहीं कर पाते और आहार बिना पचे ही आंत में आगे की ओर सरकते हुए आंव के रूप में बाहर निकल जाता है। आहार का उचित पाचन नहीं होने से विटामिन, कैल्शियम, ग्लूकोज, वसा आदि का भी सम्यक पाचन एवं शोषण नहीं हो पाता । पोषण अभाव से व्यक्ति कालान्तर में अति दुर्बल हो जाता है, वजन घटने लगता है, उसे अपच हो जाता है, वसायुक्त दस्त आने लगते हैं। संग्रहणी रोग को उत्पन्न करने वाले प्रमुख कारण आहार-विहार होता है, इस रोग के प्रमुख कारण निम्न लिखित हैं –

अधिक व दूषित आहार

आहार मात्रा (भूख) से अधिक, अत्यंत रूखे, दूषित, गरिष्ठ, तीखे, गर्म, ठंडे या बासी भोजन का सेवन, अपनी प्रकृति विरुद्ध आहार का सेवन, दूषित जल या अन्य रासायनिक पेय तथा चरस, गांजा, अफीम आदि नशीले पदार्थों के सेवन से अग्नि मंद होकर ग्रहणी रोग को उत्पन्न करती है।

विहार

 रात्रि जागरण, दिन में सोना, भोजन के तुरंत बाद स्नान या मैथुन करना , मल-मूत्र आदि वेगों को जबरदस्ती से रोक कर रखना, पंचकर्म का मिथ्या योग या अति योग आदि संग्रहणी  रोग को उत्पन्न करते हैं।

संग्रहणी रोग (Collectible disease) के लक्षण

संग्रहणी रोग में निम्न लक्षण होते हैं –

  • भोजन से अरुचि होना ।
  • स्वाद की अनुभूति नहीं होना।
  • लार अधिक आना।
  • प्यास अधिक लगना।
  • हाथ-पैरों में सूजन आना ।
  • संधियों में दर्द होना।
  • सिरदर्द होना ।
  • खट्टी डकारें आना।
  • उल्टी होना।
  • बुखार आना ।
  •   मूर्छा होना ।
  • आंखों के सामने अंधेरा छा जाना ।
  • शरीर दुबला होना ।
  • आलस्य आना ।
  • बल का नाश होना ।
  • आहार का देर से पचना।
  • प्यास अधिक लगना।
  • शरीर में भारीपन होना ।

संग्रहणी रोग के प्रकार

संग्रहणी रोग मुख्यता 5  प्रकार की होती है –

1- वातज संग्रहणी

वातज संग्रहणी रोगी बहुत देर में कष्ट पूर्वक कभी रूखा, कभी द्रव, आम एवं फेन युक्त मल का त्याग करता है। इसमें पाचक रसों के स्राव एवं आंत की गति को नियमित करने वाली वातनाडियों की क्रिया में विकृति आ जाने से मल अपक्व या अर्धपक्व अवस्था में ही निकल जाता है। सभी धातुओं में व्याप्त आमदोष, रक्ताल्पता और वात विकृति से हदय प्रदेश, गर्दन, कंधे, पीठ, पिंडलियों आदि में दर्द होता है । गुदा में कैंची से काटने के समान पीड़ा होती है। रोगी को मीठे, खट्टे, नमकीन, कड़वे, तीखे, कसैले के सेवन की प्रबल इच्छा होती है। भोजन के तुरंत बाद रोगी स्वस्थता का अनुभव करता है, किंतु भोजन पचते समय एवं भोजन पच जाने पर वायु की वृद्धि होने से पेट फूल जाता है।     (संग्रहणी रोग के कारण लक्षण और घरेलू उपचार)

2- पित्तज संग्रहणी

इसमें  रोगी नीले या पीले रंग के पतले मल का जलन के साथ त्याग करता है। साथ ही हृदय प्रदेश, गुदा, पार्श्व, पेट एवं सिर में भी दाह होता है । दूषित पित्त की अतिवृद्धि से खट्टी एवं दुर्गंधयुक्त डकारें आती हैं तथा भोजन में अरुचि, प्यास अधिक लगना आदि लक्षण प्रकट होते हैं।

3- कफज संग्रहणी

कफज संग्रहणी  में रोगी आम एवं श्लेष्मा मिश्रित ढीले एवं गुरु मल का बारंबार त्याग करता है। रोगी को हृदय प्रदेश, गुदा, पार्श्व, पेट एवं सिर में भारीपन महसूस होता है । इसके अतिरिक्त उल्टी, अरुचि, मुंह मीठा रहना, लार अधिक आना, मीठी डकारें आना, सर्दी-खांसी होना, बार-बार थूकने की प्रवृत्ति आदि लक्षण भी प्रकट होते हैं।

4- कफज संग्रहणी

कफज  संग्रहणी में जीवनीय अंश की कमी एवं जलीय अंश की अधिकता होने से हाथ-पैरों में सूजन आ जाती है तथा धातुओं का सम्यक पोषण न होने से रोगी दुर्बलता का अनुभव करता है।

5-त्रिदोषज संग्रहणी

त्रिदोषज संग्रहणी में उक्त चारों दोषों के मिले-जुले लक्षण प्रकट होते हैं।

संग्रहणी रोग के घरेलू उपचार

संग्रहणी रोग के घरेलू उपचार निम्न प्रकार से कर सकते हैं –

  • बेल के कच्चे फल को आग में सेंक कर उसका गुदा निकाल कर, दस ग्राम गुदे में थोड़ी सी चीनी मिलाकर सेवन करते रहने से इस रोग से लाभ होता है ।
  • दो ग्राम भांग को भूनकर तीन  ग्राम शहद में मिलाकर चाटने से इस रोग में शीघ्र लाभ होता है।
  • छह ग्राम खजूर के फल को गाय के दूध से बनी बीस  ग्राम दही के साथ सेवन करने से बच्चों को  संग्रहणी रोग से लाभ होता है।
  • पचास  ग्राम मीठे आम के रस में मीठी दही दस  बीस  ग्राम तथा एक  चम्मच अदरक का रस रोज दिन में दो से तीन  बार लगातार पिलाने से कुछ दिन के बाद इस लोग में चमत्कारिक रूप से लाभ होता है।
  • पिप्पली, भांग तथा सोंठ के चूर्ण तथा पुराना गुड़ छह-छह  ग्राम एकत्र कर के इन्हे खरल कर तीन  ग्राम की मात्रा में दिन में तीन- चार  बार लेने से संग्रहणी में लाभ होता है।
  • बड़ी इलायची के दाने दस  ग्राम, सौंफ साठ ग्राम, नौसादर बीस  ग्राम सभी को तवे पर भून कर चूर्ण बनाकर सुरक्षित रख लें तथा  इसे एक-एक  ग्राम की मात्रा में सेवन करने से इस रोग में लाभ होता है।
  • खाना बनाते समय उसमें दालचीनी, पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, सोंठ, मरिच, कैथ का गूदा, मोचरस, पंचकोल, नागरमोथा आदि का प्रयोग करना लाभ दायक होता है।

संग्रहणी रोग में परहेज

इस रोग में परहेज  रखना अति आवश्यक है, क्योंकि जरा सी भी बदपरहेजी इस  रोग को लक्षणों को तुरंत पुन: से उभार देती है। इस  रोग में निम्न परहेज रखना आवश्यक होता है –

  • चिकनाई युक्त पदार्थ ।
  • गरिष्ठ पदार्थ।
  • अधिक तेल।
  • पसालेदार भोजन।
  • अरबी, भिंडी आदि लसदार सब्जियां।
  • मांसाहार जैसे मीट मछली आदि ।
  • सभी मादक एवं उत्तेजक पदार्थों का सेवन ।
  •  किसी भी तरह का भारी परिश्रम आदि ।

संग्रहणी रोग में फायदा करने वाले पदार्थ

संग्रहणी रोग में निम्न पद्रार्थों का सेवन लाभ प्रद रहता है –

  • गेहूं, ज्वार या बाजरे की रोटी।
  • पुराना चावल।
  • मूंग, मसूर या कुलथी की दाल।
  • लौकी, कद्दू, तुरई, परवल की सब्जी।
  • बकरी का दूध,।
  • दही, मट्ठा, मक्खन।
  • शहद का सेवन ।
  • कैथ, बेल, अनार, संतरा, केला, पपीता का सेवन ।
  • धान के लावे का मांड।
  • सिंघाडा  का सेवन ।

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