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Muhammad yunus – 2006 का नोबेल शांति पुरस्कार विजेता

न्न  1970 में लगभग 30 वर्षीय उम्र का एक नौजवान मोहम्मद  यूनुस / Muhammad yunus  जो अपनी कद-काठी और तौर-तरीकों से साधारण से व्यक्तित्व का मालिक दिखाई देता था, अपने इलाके और अपनी भाषा के लोगों के साथ हो रहे आर्थिक एवं सामाजिक अत्याचार से व्याकुल होकर प्रतिरोध के उस संघर्ष में शामिल हो गया था, जो पाकिस्तानी हुक्मरानों के खिलाफ बांग्ला- अस्मिता की रक्षा के लिए तेजी से एक रूपाकार ग्रहण कर रहा था। तब शेख मुजीब उर रहमान के नेतृत्व में उस जैसे हजारों नव युवक संसार के मानचित्र में कुछ नई लकीरें बना रहे थे, यही लकीरें आखिरकार एक स्वतंत्र राष्ट्र की सीमाएं बनीं। बांग्लादेश की मुक्तिवाहिनी का यह जांबाज लड़ाका स्वाधीनता के संघर्ष के लिए जन-जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से बांग्ला भूमि के चप्पे-चप्पे में घूमता रहा और युवजनों को बटोरने के काम में लगा रहा।

वह दिन भी आया जब मुक्तिवाहिनी का संघर्ष और सपना दोनों कामयाब हुए और पाकिस्तान की पंजाबी अधीनता से बाहर आकर बांग्लादेश ने अपना माथा ऊपर उठाया और एक सोनार बांग्ला स्थापित हो गया। देश की आजादी के साथ ही इस नौजवान की जिम्मेदारी का एक हिस्सा तो पूरा हुआ, परंतु जिम्मेदारी पूरी तरह खत्म नहीं हुई। उसने मुक्तियुद्ध के दौर में बांग्लादेश के ग्रामीण अंचलों का दौरा किया था और देश की असली तस्वीर देखी थी । सुदूर वन प्रीतरों में बसे लोगों की फटेहाल ज़िंदगी ने उसे हिलाकर रख दिया था। एक ओर उसका दिल अपने प्यारे बांग्लादेश की स्वाधीन अस्मिता के निर्माण के लिए धक-धक कर रहा था, तो दूसरी ओर उसका दिमाग अलहदा किस्म की दूसरी ही चिंता के गिरफ्त में जा चुका था। वह निर्धनता की बदसूरत शक्ल का दीदार करने के बाद से ही इतना बेचैन था कि अपने मुल्क की स्वाधीनता की दिलकश प्रभाविन्वित तक उसे फुसला न सकी। ना फुसलाए जा सकने वाली इसी शख्सियत का मालिक है मोहमद्द यूनुस । हमारी, शांति का नया मसीहा । आज हम 2006 का नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद  यूनुस / Muhammad yunus   की बात करते हैं ।

मोहमद्द यूनुस का जन्म और शिक्षा –

 28 जून 1940 को चिटगांव, बांग्लादेश में जन्मे यूनुस 14 बच्चों में तीसरे नंबर के हैं। जिनमें से पांच बच्चों की बचपन में ही मृत्यु हो गई थी। यूनुस एक समृद्ध परिवार से थे और इसलिए वह प्रारंभिक शिक्षा लेने में भी सक्षम रहे। स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही वे बॉयज स्काउट से भी जुड़ गए। अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की डिग्री उन्होंने अपने देश के कॉलेज से ही प्राप्त की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने प्रिंटिंग का बिजनेस शुरू किया उस समय उनकी सारी प्रिंटिंग पश्चिमी पाकिस्तान में होती थी। जिसे बाद में उन्होंने अपने परिवार को सौंप दिया। जल्द ही उन्हें इंग्लैंड जाकर पढ़ाई करने का अवसर मिला और फिर उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में जाने का सोचा, लेकिन उन्हें वह सही वक्त नहीं लगा।

1964 में  मोहम्मद  यूनुस / Muhammad yunus  नें   एक नोटिस देखा और यूनाइटेड स्टेट्स में फुलब्राइट स्कॉलरशिप के लिए आवेदन कर दिया। उस आवेदन पत्र में यूनुस ने ‘विकसित आर्थिकी’ को विषय के रुप में प्राथमिकता दी। इस प्राथमिकता के आधार पर उन्हें वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी से स्कॉलरशिप के लिए अनुमति मिल गई। वेंडरबिल्ट का वन ईयर प्रोग्राम इन डवलपमेंट इकोनॉमिक्स मौलिक बातों से काफी दूर था, इसलिए यूनुस ने यूनिवर्सिटी से इस कोर्स को करने की बजाय पीएचडी करना ज्यादा बेहतर समझा। फुलब्राइट स्कॉलरशिप और ग्रेजुएट रिकॉर्ड परीक्षा में 98 प्रतिशत अंक प्राप्त करने के बाद यूनुस को इस आधार पर वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी से 1969 में अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि मिल गई। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वे 1970 में मिडिल तनीसी स्टेट यूनिवर्सिटी, मुरफ्रीसबोरो में प्रशिक्षक के तौर पर नियुक्त हुए। वहां उन्होंने 1972 तक पढ़ाया। सात साल अमेरिका में रहने के बाद, एक बार उन्होंने रेडियो पर सुना कि पाकिस्तानी सेना ने राजधानी ढाका को अधिकृत कर लिया है। बांग्लादेश लौटने के बाद और गांव वालों की गरीबी और साहूकारों से सौदे के दौरान पैदा होने वाली खराब स्थिति को देखते हुए यूनुस को माइक्रोलेंडिंग का विचार आया।

मोहमद्द यूनुस का प्रारम्भिक जीवन –

 मोहमद यूनुस / Muhammad yunus  अपनी पढ़ाई पूरी के बाद बांग्लादेश के चित्तगोग विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे। सन 1976 में उनके विभाग को क्रियात्मक शोध परियोजना मिली। उसके लिए वे अपने कुछ विद्यार्थियों के साथ पास के ही एक गाव जोबरा गए। इस गांव में दूसरे अन्य गांवों की तरह ही साहूकारों का कठोर शिकंजा गरीबों की गर्दन पर अपनी पकड़ पुश्त-दर-पुश्त बनाए चला आ रहा था।  मोहमद यूनुस ने गांव की आर्थिक सामाजिक परिस्थितियों का अध्ययन किया और इस नतीजे पर पहुंचे कि यदि इन्हें अपनी आजीविकावर्धन के कामों के लिए थोड़ा सा धन उपलब्ध हो जाए तो ये हुनरमंद लोग अपने हालात बदल सकते हैं।

वे एक परिवार की आजीविकावर्धन योजना तैयार व्यावसायिक बैंक से मिले। बैंक ने इस बिना गारंटी पर कर्ज देने से इनकार कर दिया कि निर्धनों के पास कर्ज और सूद चुकाने की हैसियत नहीं है। मो. यूनुस ने अपनी गारंटी देकर एक ग्रामीण महिला को कर्ज तो दिलवा दिया, पर यह बात उनके मन में गड़ गई कि जब तक गरीबों का अपना बैंक नहीं होगा उन्हें कर्जे नहीं मिल पाएंगे। उस महिला ने बैंक के कर्ज से अपना घरेलू व्यवसाय चलाया, मुनाफा कमाया और कर्ज की रकम भी ठीक समय पर चुका कर मो. यूनुस साहब के इस भरोसे को मजबूत बनाया कि गरीब ही कर्ज चुकाने की हैसियत रखते हैं।

खुद   मोहमद  साहब इस प्रयोग से उत्साहित हुए और उन्होंने अपने प्रोजेक्ट अन्य गांवों में भी लागू कर दिया। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि प्रयोगों की सफलता की दर तो लगातार बढ़ रही थी, परंतु बैंक अपनी खोल वे से बाहर आने को तैयार न थे। वे इस वास्तविकता से भी वाकिफ थे कि निर्धनता के खिलाफ संघर्ष करने के लिए सरकार और सरकारी साधनों से मदद पाना हथेली पर सरसों जमाने के समान है। तब तो और भी जब नया स्वाधीन राष्ट्र अपने को ही संभालने में मशगूल हो। ऐसे में  मोहमद यूनुस साहब के सामने किसी दूसरे विकल्प और दूसरी रणनीति से काम करने की चुनौती सामने आई। उन्होंने ‘आत्मनिर्भरता के आत्मसहयोग’ का ऐसा कठिन और लगभग असंभव सा दिखने वाला रास्ता चुना, जो पहले कभी कारगर होने का कोई सबूत इतिहास के पन्नों पर नहीं दर्ज करा पाया था।

यूनुस साहब / Muhammad yunus  ने अपने सपने में बांग्लादेश की स्त्रियों को शामिल उनके छोटे-छोटे समूह बनाए। अभावों और अल्पतम मजदूरी में भी कुछ बचत अवश्य करने का मंत्र सिखाया। एक टका हफ्ता भी बचाया जाए तो वह सौ टका हफ्ता कमाने से बड़ी रकम है। कोई कितना कमाता है यह महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि वह कितना बचाता है यह कहीं ज्यादा अहमियत रखता है। हर साल नदियों में आने वाली बाढ़ों से तहस-नहस और युद्ध से उबरे बांग्लादेश में खेतीबाड़ी ओर मजदूरी का कोई पुख्ता आधार ही न बन पाया था। हां, नैसर्गिक रूप से वहां जूट, धान और मछलियों की ऐसी संपदा जरूर मौजूद है, जो जीवन को चलाए और बनाए रखने की संभावना को जिलाए रखती है।

‘बास्क’ नामक गैरसरकारी संगठन का निर्माण –

भारत की तुलना । में बांग्लादेश का एक और भी दुर्भाग्य है कि वहां जमींदारी प्रथा का वर्चस्व आज भी बना हुआ है। उस पर साहूकारों का शोषण। इन्हीं के चलते स्वावलंबन, आयवर्धन, स्वतंत्रता और लोकतंत्र जैसे मुद्दों के लिए काम करना मुसीबतों के पहाड़ों से टकराने जैसा है। यूनुस साहब ने नैसर्गिक साधनों से ही गरीबी का उन्मूलन कर डालने का जेहन बनाया तो लड़ने की हिम्मत भी पा ली। उन्होंने ‘बास्क’ नामक गैरसरकारी संगठन का निर्माण किया। अपने जैसे विचारों वाले हिम्मतवर लोगों की टीम बनाई और शुरुआत कर दी। बैंकों की दकियानूसी सोच के लिए वह दिन दुर्भाग्यपूर्ण बनकर आया जब सन 1983 में ग्रामीण बैंक की अवधारणा के साथ यूनुस साहब बैंको के संसार में बैंकों को ही आईना दिखाने कूद पड़े थे। उनका काम और हौसला बढ़ता ही गया। वे चित्त गांव से चलकर ढाका, खुलना, चहगांव जैसी नई-नई  जगहों में अपने पैर जमाने लगे।

ग्रामीण बैंक की स्थापना –

ग्रामीण बैंक की अवधारणा में जो बातें शामिल हैं, उनमें आपसी विश्वास, भागीदारी और रचनात्मकता प्रमुख है। उन्होंने पुरानी बैंक नीतियों के धुरै उड़ाकर रख दिए। जमानत के बिना ही कर्ज देने की शुरुआत की। गरीबों में सबसे गरीब को कर्ज देने की प्राथमिकता में शामिल किया गया। बस कर्ज ही वह हथियार था जो निर्धनता से लड़ने के अस्त्र के रूप में गरीबों के हाथ लगा और कारगर भी साबित हुआ। मो. यूनुस का विश्वास है कि यदि निर्धनों को उनकी वास्तविक परिस्थितियों और कारणों को ध्यान में रखकर आर्थिक स्रोत उपलब्ध करा दिए जाएं तो इसके माध्यम से करोड़ों जिंदगियों को बदला जा सकता है। आज ग्रामीण बैंक के पास 73 लाख से ज्यादा ऋण कर्ता हैं, जिनका 98 प्रतिशत महिलाएं हैं। बैंक की 2,226 शाखाएं हैं जो 71,371 गांवों की जरूरतों को पूरा करने में जुटी हुई हैं। इसके कुल कर्मचारियों की संख्या का 82 फीसदी भाग महिलाओं से पूरा होता है। महिलाएं थी ही उसका लक्ष्य समूह है, क्योंकि उनसे बढ़िया प्रबंधक तथा नैतिक कोई और हो नहीं पाता।

माइक्रोक्रेडिट बैंक की स्थापना –

प्रो. मोहम्मद यूनुस ने चिटगांव विश्वविद्यालय में अध्यापन करते हुए सन 1973-75 के दौरान अपने छात्रों और शिक्षकों के सहयोग से कई बार गांवों की स्थिति के आकलन के लिए अभियान चलाए। ग्रामीण निर्धनता और किसानों की स्थिति पर उनके निष्कर्ष चौंकाने और बेचैन करने वाले थे। मोहम्मद यूनुस ने बांग्लादेशी गांवों में एक प्रयोग के रुप में 1976 में इसे शुरू किया। उन्होंने इस प्रोजेक्ट को दो और गांवों में, फिर पांच, दस और पचास गांवों में बढ़ाया। और सभी गांवों गई। कई बैंकों उन्हें वैसी ही सफलता मिलती बात करने के बाद, स्टेट बैंक ने इस उद्देश्य में उनका साथ दिया और तीन लाख परिवारों को लोन मिल गया। और कुछ समय बाद 1983 में उन्होंने खुद का बैंक खोल लिया और उसका नाम ‘ग्रामीण माइक्रोक्रेडिट बैंक’ रखा।

माइक्रोक्रेडिट –

यह छोटे लोन का विस्तार है, इतना छोटा जैसे कुछ सौ रुपए, उन गरीब लोगों के लिए जिनका कोई स्थायी रोजगार नहीं है। कुछ लोग, जो नियमित बैंकों से लोन और क्रेडिट लेने में अयोग्य हैं, वे इस छोटे से ऋण को छोटे व्यापार की शुरूआत करने के लिए इस्तेमाल कर सके। इससे वे खुद को गरीबी के चक्र से बचाने, अपने परिवार को खिलाने और उनकी आवश्यक जरूरतों को पूरा करने में भी सक्षम हुए। इस तकनीक का प्रशासनिक ढांचा काफी सरल है जिससे लोन लौटाने की अवधि काफी कम है। इस माइक्रोक्रेडिट सिस्टम से सबसे ज्यादा लाभांवित होने वाले लोगों में महिलाएं हैं।

मोहम्मद यूनुस के विचार –

मोहम्मद यूनस / Muhammad yunus यह भी कहते हैं कि बैंक कोई प्रतीक्षालय नहीं है, जहां लोगों का रास्ता देखते हुए वक्त बिताया जाए, बल्कि बैंकों को ही लोगों तक जाना होगा। इस तरह जो शुरुआत निर्धनों की जीवनशैली बदलने के लिए की गई थी, वह बैंकों की कार्यशैली बदलने के काम भी आई। ग्रामीण बैंक इस बात के लिए वचनबद्ध है कि कर्ज की ब्याज राशि कभी भी कर्ज की रकम से ज्यादा नहीं होना चाहिए। कर्जदार की मृत्यु हो जाए तो परिवार से भरपाई करने को नहीं कहा जाता। इसके लिए ग्रामीण बैंक ने बीमा कंपनियों की सहायता प्राप्त कर रखी है।

मोहम्मद यूनुस अंतरास्ट्रीय पहुंच –

मोहम्मद यूनुस साहब / Muhammad yunus  का यह सफर बांग्लादेश की सीमाओं में ही नहीं ठहर गया है, बल्कि वह दुनिया के 37 मुल्कों में पहुंच गया है। नोबल पुरस्कार से नवाजे जाने के बाद  मोहम्मद यूनुस के ग्रामीण बैंक की ही चर्चा प्रमुख रूप से चर्चा हो रही है, जबकि यह एक आधारभूत संरचना ही है, जिस पर गरीबी उन्मूलन का किला खड़ा हुआ है। सिर्फ ‘बचत करना’ ही कोई बड़ा आर्थिक परिवर्तन नहीं लाता, बचत को उत्पादकता से जोड़कर ही आगे की आर्थिक लड़ाई की जा सकती है। इसी धारणा को लेकर मोहम्मद यूनुस ने अपने साथियों से मशवरा किया और ग्रामीणों के पारंपरिक ज्ञान तथा कौशल पर बचत और कर्ज का औजार प्रयुक्त करने का मन बनाया। जूट, कोसावस्त्रों पर कसीदाकारी और मछलियां जैसी स्थानीय वस्तुओं की उत्पादकता और उसे आधुनिकता प्रदान करने के लिए ‘बास्क’ ने ब्लॉक स्तर पर उत्पाद सह प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना की। मोहम्मद यूनुस अपने देश के बाजारों की सीमाओं को पहचानते थे, इसलिए वे बांग्लादेश से बाहर निकले और यूरोप एवं अमेरिकी देशों के बाजार में जा पहुंचे। अब तक दुनिया के 50 देशों में उनके शोरूम और विक्रय केन्द्र खुल चुके हैं। निर्यात के कारण बांग्लादेश की राष्ट्रीय आय में इजाफा हो रहा है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य –

मोहम्मद यूनुस / Muhammad yunus  का  संगठन दूसरा बड़ा काम स्वास्थ्य के क्षेत्र में कर रहा है। ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य की मूलभूत सेवाओं से लेकर ढाका में पांच सितारा स्वास्थ्य सुविधाएं जुटाने वाले वहीं हैं। उनकी खुद की मजबूत परिवहन व्यवस्था भी है। एक गैर सरकारी संगठन ‘तरुण संस्कार’ के डॉ. वी.पी. चतुर्वेदी बताते हैं कि “1980 में मैं बांग्लादेश गया था। ढाका में ‘बास्क की 40-41 मंजिला 4 इमारतें देखकर चकित रह गया था। तब इनसे पाच करोड़ रुपया प्रतिमाह किराया आता था। गाड़ियों में वायरलैस सिस्टम है ।”

मोहम्मद यूनुस शांति का मसीहा –

नोबेल परुष्कार वालों को  शांति का मसीहा दुनिया के सबसे निर्धन देश में, वहां के गरीबों के बीच काम करता हुआ मिला। उसके कारण खोजकर्ता विवश हो गए कि वे शांति की परिभाषा में तब्दीली लाने के लिए कुछ नए शब्द, कुछ नई ध्वनियां और कुछ नए अर्थ भी ईजाद करें । मोटे तौर पर शांति का मतलब हिंसा मिटाने और मनुष्यता विरोधी अस्त्र-शस्त्र के निर्माण से विरत होने में ही खोजा जाता है। पर आज, आज तो अर्थों की स्थूलता चकित खड़ी है। शांति की सरलीकृत परिभाषाओं के चौहददी से बाहर, धरती के अंधेरे कोने में वे पिछली अर्धशती से निर्धनतम लोगों के बीच सक्रिय रहे हैं और आज उनकी इस सक्रियता को पहचान लिया गया है। वे हैं कि बिना किसी हो-हल्ले के गरीबी के खिलाफ जिहाद बने हुए हैं।

सुखद-

अचरज के लिए यह काफी होगा कि जिस दौर में कठमुल्लाओं के हाथ में जिहाद का स्वरूप तय करने की ताकत कैद हो गई हो तब एक आदमी उसके असली मायने के साथ अडिग खड़ा हुआ है। इतना ही नहीं, उसने पूरी दुनिया से मनवा लिया है कि उसका रास्ता ही जिहाद का असली रास्ता है। तो, बांग्लादेश के मोहम्मद यूनुस / Muhammad yunus  के रूप में शांति का नया मसीहा सबके सामने है। आधी सदी तक एक ही दिशा में वे चलते रहे और पूंजीवादी चकाचौंध से आत्ममुग्ध पश्चिम को भी यह संदेश दे पाने में कामयाब हुए कि रास्ता इधर से है। सन 2006 के लिए शांति का नोबल पुरस्कार उन्हें और उनके द्वारा संस्थापित ग्रामीण बैंक को संयुक्त रूप से दिया गया है। मोहम्मद यूनुस के माध्यम से निर्धनता को परास्त करने का जो काम बांग्लादेश में अपनी गहरी जड़ें जमा चुका है, उससे हमें प्रेरणा और सीखे ग्रहण करना ही होंगी ।। 

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