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चाय का इतिहास

चाय का इतिहास – History of Tea

चाय का इतिहास -History of Tea

                                                                            सुबह की सुनहरी धूप, हाथों में अखबार और एक प्याला गर्म चाय। दुनिया भर के लगभग एक-चौथाई से अधिक लोगों की दिनचर्या कुछ इसी तरह प्रारंभ होती है। वैसे भी चाय की चुस्कियों के बीच अखबार पढ़ने का मजा ही कुछ और है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनियाभर में सबसे अधिक पसंद किए जाने वाले इस पेय पदार्थ यानी चाय की

कहानी कहां से शुरू होती है ? चाय का इतिहास History of Tea

                                                          हैरत में न पड़िए, दुनियाभर में मौजूद तमाम व्यक्तियों व जगहों की तरह चाय का भी अपना एक इतिहास है। जी हां, चाय सौ-दो सौ नहीं, वरन लगभग पांच हजार वर्ष पुराने इतिहास को अपने आप में समेटे हुए है। दूसरे शब्दों में कहें तो इसका जन्म उस समय हुआ माना जा सकता है, जब मिस्र के सनसनी खेज पिरामिडों के निर्माता फैराहो गद्दी नशीन  थे, भारत के उत्तरी भाग में मोहन जोदड़ो व हड़प्पा जैसी महान सभ्यताएं पूरी तरह स्थापित हो चुकी थी, बेबिलोनिया व असीरिया में सभ्यताएं अपने शैशव काल में थीं और पश्चिमी दुनिया में मानव गुफाओं में रहा करता था। प्रायः विश्वास किया जाता है कि चाय का जन्म विश्व के पूर्वी हिस्से चीन में हुआ शायद यही वजह है कि चाय, चीन शब्द के अधिक करीब लगती है।

 

 

चाय का जन्म :-

चाय के जन्म के संबंध में प्रचलित एक किंवदंती :-

                                                                         एक अन्य किंदवंती के अनुसार  दुनिया भर में लोकप्रिय इस पेय पदार्थ यानी चाय की शुरुआत चीन से हुई। चाय का भी अपना एक रोचक इतिहास रहा है। चाय का इतिहास लगभग पांच हजार वर्ष पुराना है। ऐसा माना जाता है कि पहले-पहले चाय का जन्म विश्व के पूर्वी हिस्से चीन में हुआ था। एक लोकप्रिय चीनी दंत कथा के अनुसार इसकी खोज सुप्रसिद्ध चीनी शासक शेन चीन के काल में हुई, जिसने वहां 28 शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान शासन किया।

                                           शेन चीन एक महान दार्शनिक था। उसे कृषि के महत्वपूर्ण उपकरणों और चीनी दवा के आविष्कारक के रूप में भी जाना जाता है। वह काफी जिज्ञासु प्रवृत्ति का था और उसकी औषधियों के बारे में अधिकाधिक जानकारी हासिल करने में खासी दिलचस्पी रहती थी। उसने कई बार अपने ऊपर कुछ ऐसे परीक्षण भी किए, जो काफी जहरीले थे। एक बार शेन अपने बगीचे में गर्म पानी का प्याला पीते हुए टहल रहा था तभी तेज हवा चली और चीन में उगने वाली एक जंगली झाड़ी के कुछ पत्ते उसके प्याले में आकर गिर गए। गर्म पानी में मिलते ही उनमें एक अजीब सी खुशबू आने लगी और पानी का रंग बदलने लगा। शेन काफी रोमांचित हुआ और उसने प्याले से एक घुट पिया और अचंभित हो गया। वह खुशी से चिल्ला उठा और माना जाता है कि तभी से चाय का चलन शुरू हो गया और यह जंगली झाड़ी चाय की थी। 

                                              चाय के जन्म से जुड़ी एक अन्य किंवदंती ऊपर वर्णित घटना से काफी समय बाद यानी बौद्ध धर्म के प्रसार के समय की मानी जाती है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि चीन में चाय का जन्म बौद्ध धर्म के एक जैन भिक्षु धर्म के प्रसार के फलस्वरूप हुआ। भूरी आंखों वाला यह भिक्षु 526 वीं शताब्दी में भारत से चीन में बौद्ध धर्म की शिक्षा के प्रचार के लिए गया था। होनन कस्बे के एक मंदिर में ध्यान लगाते हुए, दुर्भाग्यवश वह घोर निद्रा में तल्लीन हो गया। जब वह जागा, तो उसकी आंखों में पश्चाताप के आंसू थे।

                                                           उसने इस अपराध का प्रायश्चित करने के लिए अपनी खूबसूरत पलकें नोंच डालीं। कहा जाता है कि भिक्षु द्वारा नोंची गई यह पलकें जहां-जहां गिरी वहां-वहां चाय की झाड़ियां उग आई। इन्हीं झाड़ियों की पत्तियां खाकर अब वह ध्यानमग्न रहने लगा। उसने महसूस किया कि इन पत्तियों को चबाकर वह अधिक तन्मयता और चौकन्ना रहकर तपस्या में लीन रह सकता है। बस फिर क्या था, भिक्षु ने नियमित रूप से चाय की इन पत्तियों को चबाना शुरू कर दिया। कहा जाता है कि इन्हीं पत्तियों की बदौलत वह वर्षों बिना पलकें झपकाए ध्यान मग्न रह पाया।

चाय के जन्म के तथ्य :-

                                 प्रचलित किंवदंतियों से यदि तथ्यों की ओर आया जाए, तो चाय शब्द का पहला उल्लेख 350 ईसा पूर्व में चीन में छपे एक शब्दकोश ईथ-ईया में मिलता है। तथ्य बताते हैं कि चाय को पहले-पहल एक औषधि के रूप में देखा गया। प्रारंभ में चीन में इसकी महीन हरी पत्तियों को जस का तस उबलते पानी में डाल दिया जाता था, लेकिन धीरे-धीरे लोगों ने महसूस किया कि यदि इसकी कोमल पत्तियों को तोड़कर एक निश्चित तापमान में सुखाया जाए और उसके बाद ही इसे गरमा-गरम द्रव्य में डाला जाए तो चाय का स्वाद और बेहतरीन बनाया जा सकता है। इस प्रयोग की सफलता के बाद तो चाय की लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी। आठवीं शताब्दी के शुरुआती दौर में चाय चीन और जापान में सुविधा संपन्न वर्ग के बीच खासी लोकप्रिय हो गई और उनकी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन गई। इसकी लोकप्रियता का आलम यह था कि तत्कालीन सरकार द्वारा कई बार इस पर कर लगाने संबंधी सुझाव भी दिए गए ।

 

 

चाय का विस्तार :-

                            अगर तथ्यों की बात करें तो तथ्य  बताते हैं कि चमत्कारिक चाय शब्द का उद्भव ‘टे‘ शब्द से हुआ, लेकिन जल्द ही यह शब्द चा’ शब्द में तब्दील हो गया। यही शब्द आज प्रयुक्त होने वाले ‘टी’ का जन्मदाता है। हैरानी की बात तो यह है कि अमेरिका व यूरोप जहां चाय प्रचलन में काफी समय बाद आई, वहां आज भी चाय को ‘टे’ शब्द से ही जाना जाता है। भारत में इसे चाया फिर चाय, रूस व पुर्तगाल में चा और अरबी में चाय के नाम से जाना जाता है।

                                            छठी और सातवीं शताब्दी में हालांकि चाय अपने पाउडर के रूप में उपलब्ध थी, लेकिन सामान्यतया इसके ब्रिक को ही ज्यादा पसंद किया जाता था। ब्रिक चाय उन्नीसवीं शताब्दी तक लोगों के बीच खासी लोकप्रिय रही। रूस में भी ये विशेष रूप से लोकप्रिय थी। धीरे-धीरे चीन में चाय इतनी अधिक लोकप्रिय हो गई कि इसे विशेष समारोह में लोगों को परोसा जाने लगा।

                                               दसवीं शताब्दी गनी सुंग शासन के समय चाय की कला अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गई थी। हुई-ती-सन नामक चीनी शासक के समय तो चाय बनाने की पूरी प्रक्रिया पूर्ण तया राजसी अंदाज में की जाने लगी। उसके समय में चाय की पत्तियां बीनने का काम केवल जवान लड़कियां ही कर सकती थीं। उनके हाथों में विशेष किस्म के दस्ताने हुआ करते थे। सोने की कैंचियों की मदद से वे केवल चाय की झाड़ियों से कलियां व नवीन कोंपलें तोड़ा करती थीं। इन कलियों व पत्तियों को सोने के ही बड़े बर्तन में सुखाने के लिए रखा जाता था। सूखने पर इन्हें राजा के गर्म पानी से भरे प्याले में डाल दिया जाता था। उस समय इस तरह की शुद्धता निश्चित तौर पर बड़ी बात थी। लोग दूर-दूर से इस सारी प्रक्रिया को देखने आया करते थे। इन राजसी चाय बागानों के अलावा भी कुछ बागान ऐसे थे, जिनका जिक्र महान यात्री मार्को पोलो ने भी किया।

                                                          धीरे-धीरे चाय अपनी सीमाओं को लांघते हुए समुद्र पार कर आगे बढ़ी और आठवीं शताब्दी में जापान तक पहुंच गई। 729वीं शताब्दी में जापान के शासक ने राजसी महल में जैन कार्यशाला में भाग लेने वाले सौ पुजारियों को चीनी चाय प्रदान की। इन भिक्षुओं को चाय का स्वाद लाजवाब लगा, इसलिए जब ये विभिन्न भिक्षु अपने-अपने देश लौटे तो इन्होंने अपने विहारों में चाय की झाड़ियां लगाईं। बौद्ध भिक्षु जो देर तक ध्यान लगाकर बैठते थे, ने चाय का इस्तेमाल चौकन्ना रहने के लिए किया। चाय जापान में अत्यंत लोकप्रिय पेय पदार्थ बन गई, न केवल धार्मिक कृत्यों में बल्कि सामान्य जीवन में भी चाय ने महत्वपूर्ण स्थान ले लिया।

                                                      प्रसिद्ध आर्किटेक्चर चेस्की ने चाय बागानों के खुलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसने चाय घरों की साज-सज्जा अत्यंत साधारण किंतु आकर्षक ढंग से की। इन चायघरों में हल्की चित्रकारी की जाती थी। धीरे-धीरे ये चायघर दोस्तों के मिलने का स्थान बन गए। नवीं शताब्दी में चाय की लोकप्रियता का यह आलम था कि चाय समारोह आयोजित किए जाने लगे। आज भी जापान में कई संगठन इस समारोह को मनाते हैं। चाय समारोह को जापान में लोकप्रिय बनाने का श्रेय सेन रिक्यू नामक सौदर्यवादी को जाता है, जो सोलहवीं शताब्दी में जापान के न्यायालय में कार्यरत था। धीरे धीरे चाय पूरी दुनिया में फ़ैल गयी  है , चाय की कुछ देशों  में स्तिथि निम्न प्रकार से है :-

भारत :-

              भारत दुनिया का सबसे बड़ा देश है जहां सबसे अधिक लोग चाय पीते हैं। भारत में हर जगह चाय के अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं। दार्जिलिंग में चाय बनाते समय कम पत्तियों का प्रयोग होता है। छोटी-छोटी चाय की थड़ियों पर कट (आधा गिलास चाय) और स्पेशल चाय खूब बिकती हैं। चाय बनाने की पुरानी विधि आज सचमुच पुरानी हो गई है और उसकी जगह नए-नए तरीके काम में लिए जा रहे हैं। आज भारत के लगभग सभी घरों में चाय का सेवन होता है । भारत दुनिया भर में आज चाय निर्यात कर रहा है ।

                                                      भारतीय चाय उद्योग अब बेहतर स्थिति में है। इस उद्योग के विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय चाय की छवि महत्व पूर्ण है और घरेलू व अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसकी गुणवत्ता की उत्कृष्टता के लिए प्रयास जोरों पर है। चाय को बढ़ावा देने के अपने प्रयासों में टी बोर्ड की योजनाओं में टी बूटिक की स्थापना का विचार शामिल है। टी कॉर्पोरेट्स भी इस बात की आवश्यकता को महसूस कर रहे हैं कि घर के बाहर भी चाय के उपभोग को बढ़ाना जरूरी है। चेयरमैन वासुदेब बैनर्जी के अनुसार चाय को पेय के रूप में आकर्षक बनाना होगा। हम यह कोशिश लगातार कर रहे हैं। चाय उद्योग को भारत में स्थापित करने और सरकारी नीतियों को लागू करने के उद्देश्य से भारत में 1953 में जब टी बोर्ड की स्थापना की गई थी, तभी से हम यह काम कर रहे हैं।

टी बोर्ड भारत :-

                         सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत कार्य करता है। इसका मुख्यालय कोलकाता में है। टी बोर्ड भारत में चाय शोधों को बढ़ावा देने के साथ ही अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में चाय का निर्यात करता है। चाय अधिनियम के प्रावधान के तहत ही चाय उद्योग की गतिविधियों को वर्गीकृत किया जाता है। इसका मुख्य काम भारत में चाय उद्योग की प्रगति के आंकड़ों को इकट्ठा करके वितरित करना है। इसके अलावा यह वित्तीय योजनाओं, चाय के उत्पादन व निर्यात पर नियंत्रण, विदेशों में चाय के वितरण को बढ़ावा देने के लिए रणनीति तैयार करता है। गुणवत्ता के लिए शोध प्रक्रियाओं को बढावा देता है। वैश्विक चाय बाज़ार में व्यापार को बढ़ावा देने के लिए तकनीकी सहयोग करता है।

                                    टी बोर्ड की संरचना में चाय उद्योग के विभिन्न क्षेत्रों के लोग शामिल होते हैं। जिनमें, स्टेट और चाय उत्पादकों के मालिक, उत्पादक राज्यों जैसे- असम, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, तमिलनाडु, केरल और हिमाचल प्रदेश के सरकारी प्रतिनिधि, नियतिक, आंतरिक व्यापारी और टी स्टेट में नियुक्त लोग बोर्ड में शामिल होते हैं। टी बोर्ड के मुख्य कार्यो वाय उद्योगों का विकास, चाय का व्यापार, चाय की खेती के विस्तार, चाय के शोध, कृषि की विधियों में सुधार के साथ ही अन्य लाइसेंस युक्त प्रक्रियाएं भी शामिल हैं। दैविक परिप्रेक्ष्य में लंबे समय तक बाज़ार में स्थायित्व के लिए जरूरी है कि चाय के पैकेट पर उसका श्रोत और गुणवत्ता लिखी होनी चाहिए तभी वह लंबे समय तक टिक पाएगी। शोध और विकास के लिए विश्व स्तर के संस्थानों के साथ इसका गठबंधन है। बोर्ड का लक्ष्य है कि आने वाले 15 वर्षों में 2,00,000 हेक्टेयर में पुन: वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किए जाएं, इसके लिए सब्सिडी और ऋण के लिए भी प्रस्ताव रखे जा रहे हैं।

 

श्रीलंका :-

            श्रीलंका अपनी उच्च  गुणवत्ता की चाय के लिए मशहूर है। यह विश्व स्तर पर देश के तीसरे सबसे बड़े चाय निर्यातकों में से एक है। श्रीलंका की चाय विश्व प्रसिद्ध है । 

चाइना :-

               चाइना के लोगों ने हजारों साल तक चाय का आनंद उठाया। वहां इसे एक दवाई की तरह काम में लिया गया एक ऐसी दवाई जो आपकी नींद उड़ाएगी। चाइना के पास चाय के सबसे पुराने प्रमाण मौजूद हैं, जिससे यह पता चलता है कि यह चीन में  दसवीं शताब्दी से प्रचलन में है। मशहूर लेखक लू-यू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक चा-चिंग में चाय की खेती और चाय बनाने के लिए इस काल में प्रयुक्त किए जाने वाले पानी, बर्तन, उपकरण और विधि का विस्तार से वर्णन किया है। ऐसा माना जाता है कि चाय शब्द का उद्भव ‘टे’ शब्द से ब्रिटेन हुआ, लेकिन जल्द ही यह शब्द ‘चा’ शब्द में तब्दील हो गया। यही शब्द आज काम में लिए जाने वाले ‘टी’ का जन्मदाता है।

जापान :-

                 धीरे-धीरे चाय अपनी सीमाओं को लांघते हुए छठी शताब्दी में जापान तक पहुंच गई। जब जापानी याजकों को चीन की संस्कृति की जानकारी के लिए भेजा गया तो वे वहां चाय से भी रूबरू हुए। चाय उन्हें इतनी भाई कि वह वापसी पर वहां से चाय के बीज लेकर लौटे। उस समय चाइना से चाय के बीज भी जापान भेजे जाते थे, लेकिन बाद में जापान में उनकी खेती शुरू की गई। धीरे-धीरे चाय जापान में अत्यंत लोकप्रिय पेय पदार्थ बन गई। नवीं शताब्दी में चाय की लोकप्रियता इतनी अधिक बढ़ गई थी कि चाय समारोह आयोजित किए जाने लगे। जापान में तरह-तरह की चाय प्रचलन में आ गई है, लेकिन आज भी लोग सुबह हरी चाय पीना ही पसंद करते hai

कोरिया :-

                 जापान के बाद चाय कोरिया पहुंची। ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते  हैं कि 661 में कोरिया में चाय भगवान को अर्पित की जाती थी। (918-1932 ) गोरियो डायनेस्टी राजवंश में चाय बौद्ध मंदिरों में प्रसाद के रूप में चढ़ाई जाती थी। कोरिया के लोग चाय को बेहद पसन्द करते हैं, लेकिन कोरिया का वातावरण चाय उगाने के लिए उपयुक्त नहीं है। यही वजह है कि यहां चाय बीजिंग  से मंगाई से  जाती है। यहां खास मौकों के लिए चाय बनाई जाती है।

ताईवान :-

                     ताईवान में ओ ओलांग और हरी चाय बेहद मशहूर है। इसके अलावा पश्चिमी शैली की चाय यहां खासतौर से पसंद की जाती है। बबल टी को ब्लैक टी के साथ मिलाकर इसमें ऊपर से मीठा दूध और टैपिओका डाला जाता है, जिससे एक खास तरह की चाय तैयार होती है, जो युवाओं को बेहद पसन्द है। 17वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी पहली बार एम्स्टर्डम से चाइना तक एक जहाज में हरी चाय को भरकर लाया। 1636 में चाय फ्रांस और 1648 में पेरिस में मशहूर हो गई। 1689 में चाइना से चाय नियमित रूप से आने लगी।

ब्रिटेन :-

              ब्रिटेन की सबसे बड़ी कम्पनी जे लियॉन्स एंड कंपनी ने 1909 में पहला कॉर्नर हाउस खोला। ये कॉर्नर हाउस चार या पांच मंजिल के होते थे। हर मंजिल पर एक रेस्टोरेंट होता था। इनमें हेयर सैलून, टेलिफोन बूथ, सिनेमा हॉल, खाने के कमरे के साथ चाय पीने के लिए अलग कमरे बने हुए थे। यहां हर दुकान में चार सौ नौकर होते थे, लेकिन सबसे महंगी जगह थी निपीज। यहां युवा लड़कियां घुटनों के बल चलकर टेबिल के बीच से निकलकर लोगों को चाय सर्व करती थीं। इनका काम था ऑर्डर लेकर आना फिर चाय और खाने का सामान पहुंचाना। ये लड़कियां अपना काम बेहद फुर्ती से करती थीं और उनका यह अंदाज आने वालों को चकित कर देता था। 1960 में कॉर्नर हाउसेज व रेस्टोरेंट बंद होने लगे, लेकिन छोटी से छोटी दुकान के अंदर भी टी रूम्स मौजूद थे।

ज्ञानेन्द्रियों के जरिए चाय की गुणवत्ता का वर्गीकरण करते समय चाय को चखकर, छूकर, उसकी पत्तियों का रंग देखकर और उसकी खुशबू से उसका परीक्षण होता है। ज्यादातर विशेषज्ञ चाय को सूंघकर पता लगाने का तरीका काम में लेते हैं।

 

चाय के प्रकार :-

चलिए अब हम जानते हैं कि चाय कितने प्रकार कि होती है ? और उनकी रेस्पी को भी जानते हैं ।

 

चाय मसाला विद एप्पल :-  

सामग्री :–  चाय मसाला टी बैग, एक कप उबला पानी, 1/4 एपल कॉन्सनट्रेट, एक टुकड़ा दालचीनी, चीनी या शहद स्वादानुसार।

बनाने की विधि :-  एक कप उबले पानी में चाय मसाला टी बैग मिलाएं । इसमें एपल कॉन्सनट्रेट (पानी के साथ) मिलाएं । स्वादानुसार शहद या शक्कर मिलाकर                                     दालचीनी के टुकड़े के साथ सर्व करें। इसे गरम या ठंडा दोनों तरह से सर्व किया जा सकता है।

रोज़ चाय :-

सामग्री :-  रोज़ चाय टी बैग, एक कप उबला पानी, गरम दूध, स्वादानुसार चीनी या शहद, भुने हुए पाइन नट्स ।

विधि :-   एक कप उबले पानी में रोज़ चाय टी बैग डालें। गरम दूध मिलाएं। स्वादानुसार चीनी या शहद का प्रयोग करें। स्वाद बढ़ाने के लिए भुना हुआ पाइन नट्स                      डालें और सर्व करें।  इसे गरम या ठंडा करके सर्व  किया जा सकता है।

ग्रीन टी :-

सामग्री :-  पानी एक कप, ग्रीन टी एक चौथाई चम्मच, नींबू का रस  दो से तीन बूंद ।

विधि :-     एक कप पानी तेज गरम करें। ध्यान रहे पानी उबालना नहीं है । तेज गरम पानी में ग्रीन टी डालें और आधा मिनट ढंककर रखें और फिर उसके बाद छान                     लें ।  कप में चाय डालें और उसमें दो से तीन बूंद नींबू का रस डालें । मिलाएं और सर्व करें। रोज 3-4 कप ग्रीन पीने से यह एंटी एजिंग का काम करती है ।                   साथ ही  शरीर में झुर्रियां होने से रोकने में भी सहायक सिद्ध होती है ।

आइस टी :

सामग्री :-  पानी  एक  गिलास, चाय पत्ती  एक चौथाई छोटा चम्मच, आइस क्यूब -2 से 3 क्यूब, चीनी स्वादानुसार, नींबू का रस  एक चौथाई चम्मच ।

विधि :-   पानी को चाय के पैन में गरम करें। जब पानी तेज गरम हो जाए तो उसमें चाय पत्ती डालकर गैस बंद कर लें और पैन को ढंक दें। लगभग एक मिनट पत्तियों                 को गरम पानी में रहने दें उसके बाद छान लें तब तक पत्तियां अपना रंग छोड़ देंगी। स्वादानुसार चीनी मिलाएं और चाय के पानी को ठंडा होने दें। अब एक                   कांच के गिलास में एक-चौथाई नींबू का रस डालें और उसमें चाय डाल कर अच्छे से मिक्स कर दें। गिलास में आइस क्यूब और स्ट्रॉ डालकर ठंडी-ठंडी                       आइस टी सर्व करें।

लेमन टी :-

सामग्री  :-  चाय पत्ती 2 चम्मच, पानी -300 मि.ली., नींबू का रस 2 चम्मच, चीनी स्वाद के अनुसार ।

विधि :-     पानी को कुछ मिनट तक उबालें  फिर  इसमें चाय की पत्तियों को डालते हुए कड़क लिकर बनाएं । इसे कप में छान लें और नींबू का रस मिलाएं। चीनी                        मिलाकर पिलाएं।

ब्लैक टी :-

 सामग्री :-  चाय पत्ती 2 चम्मच, पानी -300 मि.ली., चीनी स्वाद के अनुसार ।

 विधि :-     पानी को कुछ मिनट तक उबालें  फिर  इसमें चाय की पत्तियों को डालें लेकिन जयादा उबाले नहीं,  फिर इसे कप में छान लें और  चीनी  मिलाकर पिलाएं।

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