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मार्क ट्वेन का जीवन परिचय

मार्क ट्वेन का जीवन परिचय – मार्क ट्वेन के अनमोल विचार –

मार्क ट्वेन उन्नीसवीं सदी के एक प्रसिद्द अमेरिकी लेखक और विनोदी थे, जो अपनी  लघु कथाओं और उपन्यासों में क्षेत्रीय वाद के उपयोग के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। इस लेख में आज हम मार्क ट्वेन का जीवन परिचय और मार्क ट्वेन के अनमोल विचार के बारे में जानते हैं ।

मार्क ट्वेन का जन्म और प्रारम्भिक जीवन

मार्क ट्वेन का जन्म का नाम सेमुअल लैंगहार्म क्लीमेन्स था। उनका जन्म मिसोरी राज्य के प्लोरिडा शहर में 30 नवंबर 1835 को उनका हुआ था और जल्दी ही उनका परिवार मिसौरी के हनीबाग नगर में आ गया जहां उनका लालन-पालन हुआ। कार में अपनी काबिलियत का जिक्र करते हुए वे स्वयं ही कहते हैं कि उन्हें केवल शब्दों को वर्तनी सही लिखने में महारथ हासिल थी। 1847 में अपने पिता के देहान्त के बाद क्लीमैन्स (मार्क ट्वेन) को एक मुद्रक के रूप में प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए रखा गया। उन्होंने मिसिसिपी नदी पर पांच साल तक एक लाइसेंस शुदा नाविक का कार्य भी किया।

आगे चलकर वे अपने भाई के साथ वर्जिनिया शहर चले गए जहां उन्होंने वहां की स्वर्ण खदानों में अपनी किस्मत की नाकामयाब आजमाइश करने के बाद दो साल तक टेरीटोरियल एंटर प्राइज पत्र का संपादन किया। 26 वर्ष की आयु में एक व्यंग्यपूर्ण रचना छद्म नाम से प्रकाशित करने के साथ ही 3 फरवरी, 1863 को वे अपने जन्म नाम सेंमुअल क्लीमैन्स का परित्याग कर मार्क ट्वेन बन गए और यहीं से अपनी सृजन यात्रा प्रारंभ की जो आजीवन चलती रही ।

मार्क ट्वेन का जीवन परिचय

मार्क ट्वेन की सृजन यात्राएं

1864 में मार्क ट्वेन कैलिफोर्निया चले गए, जहां उन्होंने एक रिपोर्टर के रूप में अपनी सेवाएं दीं। 1866 में ट्वेन ने हवाई द्वीप की यात्रा की और वे द सैक्रामेन्टो यूनियन पत्र के संवाददाता हो गए और अपनी यात्राओं का विवरण पत्रों के माध्यम से प्रकाशित किया। इसके बाद वे फ्रांस और इटली की यात्रा पर गए और अपनी पुस्तक ‘इनोसेंटस एब्राड’ (1869) में अपने अनुभवों को लिपिबद्ध किया।                                  (मार्क ट्वेन का जीवन परिचय)

अपने जीवन में मार्क ट्वेन ने शानदार यात्रा विवरण लिखे जिनमें से एक उनकी पुस्तक एडवेंचर्स ऑफ टॉम सायर (1876) थी। इनोसेंटस एब्राड पुस्तक इतनी लोकप्रिय हुई और उन्होंने इतना धन कमा लिया कि वे 1870 में वैवाहिक बंधन में बंधने को तैयार हो गए। अपनी प्रेमिका को 189 पत्र लिखने के बाद अंततः वे ऑलिविया का हृदय जीतने में सफल हो सके। जब एटलांटिक मासिक पत्र में विलियम डीन ने उनकी इस पुस्तक की बहुत प्रशंसा की तो ट्वेन ने उन्हें धन्यवाद देते हुए कहा था कि जब मैंने आपकी समीक्षा पढ़ी तो मुझे कुछ ऐसा ही अहसास हुआ जैसे एक उस औरत को होता है जो यह देखकर खुश होती है कि उसने गोरे बच्चे को जन्म दिया है।

ट्वेन ने अपनी व्याख्यान यात्राएं अमेरिका और इंग्लैंड में जारी रखीं और 1876 से 1884 के बीच अनेक श्रेष्ठ कृतियां प्रकाशित की । ट्वेन न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, भारत, दक्षिण अफ्रीका की यात्राएं करने के बाद 1900 में अमेरिका लौटा। अपनी इन यात्राओं संबंधी उनकी पुस्तक फॉलोइंग द इक्वेटर 1897 में ही प्रकाशित हो गई थी। 1902 में ट्वेन ने अपने जन्म स्थान हैनीबाल की यात्रा की और उनकी इच्छा थी कि वे वहां शांतिपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करें, लेकिन शांत और एकान्त जीवन का उनका वह स्वप्न सौ से अधिक उन समाचार पत्रों ने भंग कर दिया जो उनकी हर हलचल पर नजर रखते थे। सन् 1904 में अपनी पत्नी और दूसरी पुत्री का देहान्त हो जाने से ट्वेन के जीवन में अंधेरा छा गया जिसका प्रतिबिंब 1924 में उनकी मृत्यु के उपरान्त प्रकाशित उनकी आत्मकथा में भी मिलता है।

मार्क ट्वेन को श्रद्दांजली

ट्वेन के जीवनी लेखक एलबर्ट बिगेलो पेने ने ट्वेन के सृजन कर्म के सिलसिले में बड़ी दिलचस्प बातें बताई हैं। उसने लिखा है कि ट्वेन प्रायः दोपहर तक अपने कीमती गाउन में बिस्तर पर शुभ्र श्वेत तकियों के सहारे लेटे हुए ही डिक्टेशन देते रहते थे। उनका ख्याल था कि उनकी यह आराम तलबी उनकी सृजनात्मकता को स्फुरित करती थी। उनका पलंग बड़ा विशाल और एक कलात्मक एन्टीक पीस की तरह था, जिसके पार्श्व में एक छोटी मेज पर उनके सिगार, पाइप और पेपर रखे होते थे।

दुनिया को हंसाने वाले, उस पर कटाक्ष करने वाले, उसका मनोरंजन करने वाले ट्वेन की जीवन दृष्टि मानव जीवन के प्रति बहुत आशा वादी नहीं रही। अपने जीवन के आखिरी सालों में वे बहुत कटु हो गए थे, उन्होंने एक बार कहा था ‘मेरा विश्वास है कि परमात्मा ने मनुष्य को इसीलिए आविष्कृत किया, क्योंकि उसे बंदर को बनाने से तसल्ली नहीं हुई।’ हर मोड़ पर उनका चरित्र, उनका इतिहास, उनके वस्त्र और उनका धर्म, एक उलझन भरी पहेली सा लगता है। उसके आगे हमारा सारा धार्मिक उत्साह निस्तेज और शिथिल नजर आता है।  अपनी  प्रसिद्ध यात्रा पुस्तक ‘फॉलोइंग द इक्वेटर’ में उन्होंने अपनी यात्राओं का विवरण बेइन्तहा दिलचस्प ढंग से किया है। उनके यात्रा विवरणों में हास्य और विनोद का पुट अद्भुत है। एक स्थान पर उन्होंने जिक्र किया है कि किस प्रकार एक शार्क मछली एक आदमी और उसके लंदन टाइम्स की प्रति को इंग्लैंड में निगल गई और फिर दस दिन बाद उसने उसे ऑस्ट्रलिया के एक शार्क मछली मार को सौंप दिया। इस आदमी को जरूर उससे कछ आमदनी हुई होगी, क्योंकि शार्क ने समाचार की प्रति उसे दी, उसमें  ऊँन के बाजार भाव छपे हुए थे जो उस व्यक्ति को कई सप्ताह पहले मिल गए थे, जो कि उसे कायदे से स्टीमर द्वारा कई सप्ताह बाद मिलते।

मार्क ट्वेन का जीवन परिचय

मार्क ट्वेन की भारत यात्रा

अपने प्रकाशन गृह के असफल हो जाने और करीब एक लाख डालर के कर्ज से दब जाने व अन्य वित्तीय संकटों में आकंठ डूब जाने पर ट्वेन ने अपने को ऋण मुक्त करने के लिए एक महत्वाकांक्षी यात्रा कार्यक्रम ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, इंग्लैंड, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, फिजी, श्रीलंका और भारतवर्ष भ्रमण का बनाया। अपनी इस लंबी यात्रा के दौरान ट्वेन के साथ उनकी पत्नी, एक पुत्री और एक सहयोगी स्मिथे साथ थे, जिन्होंने उनके व्याख्यानों के कार्यक्रमों की परिक्रमा की उससे उन्होंने अपना ऋण चुकाने के लिए बहुत सारा धन जुटा लिया था ।

उनकी इस सफलता का एक बड़ा श्रेय भारतवर्ष को जाता है, जहां प्रचार माध्यमों के जरिये उनके भाषणों को सुनने के लिए भारी भीड़ उमड़ पड़ती थी। मुंबई के अधिकांश सभागारों में जहां उनके भाषण होते, लगभग 1000 लोगों के बैठने की क्षमता होती और अक्सर अतिरिक्त कुर्सियां लगानी पड़ती। मुंबई के नॉवल्टी थियेटर में उनके भाषणों के आयोजनों में श्रोताओं की तीन श्रेणियां होती थीं। अपने तीन घंटे की रोचक कथाओं, चुटकुलों और हास्य-व्यंग्य के प्रसंगों से परिपूर्ण उनके भाषण से हर शाम भारतीय मुद्रा में लगभग ढाई हजार रुपए एकत्र होते, जो आज के 50 हजार रुपयों के बराबर थे। ट्वेन के कार्यक्रम पर टिप्पणी करते हुए एक दर्शक ने कहा था- ‘मार्क ट्वेन भारत आए और यहां के लोगों का दिल जीत लिया। अंग्रेज लोग डेढ़ सौ साल के शासन से जो नहीं कर सके, वह उसने एक दिन में कर दिखाया।’ ट्वेन को यह बात अच्छी तरह मालूम थी कि हिंदुस्तान ऐसी जगह है जहां नैतिक और दार्शनिक विषयों का सदा स्वागत होता है, इसलिए भारतीय श्रोताओं के लिए उसने अपने इसी तरह के कार्यक्रम बनाए, जिन पर लोग मुग्ध हो गए।       (मार्क ट्वेन का जीवन परिचय)

18 जनवरी से 31 मार्च, 1896 के बीच मार्क ट्वेन ने भारत के अनेक नगरों की यात्राएं कीं और यहां के निवासियों के नानारंगी जीवन को सूक्ष्म दृष्टि से देखा और जाना-पहचाना। हमारे इतिहास और हमारी सांस्कृतिक सम्पदा ने उन्हें इस प्रकार प्रभावित किया था कि उन्होंने एक स्थान पर लिखा कि ”भारत में समस्त विश्व की सारी चीजें सबसे पहले शुरू हुईं। यहां की सभ्यता पहली सभ्यता थी। यहां की भौतिक सम्पदा भी विश्व की सबसे पहली सम्पदा थी। और अधिक विचारक व बद्धिजीवी भी यहीं पैदा हुए। यही एक मात्र देश है, जिसका संसार की श्रेष्ठतम विशिष्टताओं पर एकाधिकार रहा है। दूसरे देशों में कोई एक उल्लेखनीय वस्तु हो सकती है, पर यहां तो हर वस्तु उल्लेखनीय है। किसी देश में कुछ वस्तुएं दोहरी हो सकती हैं, लेकिन भारत के चमत्कार अपने हैं। इनका कोई अनुकरण संभव नहीं है। उनकी विशालता, उनकी भव्यता और उसका स्वदेशी चरित्र अपने आप में अनुपम है।

मार्क ट्वेन की भारत के बारे में विचार

अमेरिका के विश्व प्रसिद्ध व्यंग्यकार, उपन्यासकार, पर्यटन-लेखक और वाक्-विदग्ध भाषण-कर्ता ट्वेन के, जो उन्होंने उस समय व्यक्त किए, जब वे एक सदी से कुछ अधिक पहले 18 जनवरी, 1896 को मुंबई पोर्ट पर पहुंचे और वहां के जीवन की इन्द्रधनुषी हलचल से अभिभूत हो उठे और उन्होंने लिखा  “यह हिंदुस्तान है ! सपनों और राग-रंग की धरती, बेइन्तहा दौलत और बेइन्तहा दरिद्रता की धरती, शान-शौकत और फटे हाल लोगों की धरती, महलों और झोपड़ियों की धरती, अकाल और टिड्डी दल के हमलों की धरती, मामूली लोगों और महान हस्तियों की धरती, अलादीन के चिराग, शेरों और हाथियों की धरती, काले नाग और जंगलों की धरती, यही है एक सौ राष्ट्रों के एक देश की सरजमीं, सैकड़ों जुबानों, हजारों धर्मों और बीस लाख देवी-देवताओं की धरती, मानव सभ्यता के फलने-फूलने की क्रीड़ास्थली, मनुष्य की वाणी की जन्मभूमि, इतिहास की जननी, आख्यानों की दादी, ५ प्पराओं की परदादी, जिसका अतीत दुनिया के शेष हिस्सों से प्राचीनतम है। संसार में सूर्य के नीचे विश्व का यह एक ही देश है, जहां एक तरफ लोग गरीबी में है, बंधन में हैं और मुक्त भी हैं, एक ऐसा देश जिसे सब लोग देखने की इच्छा रखते हैं। जिसने भी एक बार देख लिया, या एक झलक भी ले ली, वह सारे संसार के दर्शन से कहीं बढ़कर है।”

ट्वेन ने हिंदुस्तान में मुंबई, पूना, बनारस, कलकत्ता, दार्जिलिंग, आगरा, जयपुर, दिल्ली और दूसरे अनेक नगरों की यात्राएं की, जिनमें से अधिकांश यात्राएं रेल से की गई थीं। इन यात्राओं के दौरान उन्होंने अपनी तेज निगाहों से अपने आसपास जितना और जो कुछ देखा, उसे उन्होंने अपने यात्रा वर्णनों में समाविष्ट किया। यहां तक कि उन्होंने कौओं, बाघों और हाथियों के बारे में भी लिखा। उन्होंने हिंदुस्तान की होटलों, यहां की खुशनुमा पार्टियों, लोगों के लम्बे लम्बे नामों, गलियारों, फकीरों और वेशभूषा के बारे में भी बहुत कुछ लिखा। रेल यात्राओं के अपने दिलचस्प अनुभव को बयान करते हुए एक स्थान पर उन्होंने लिखा है ”दूसरे देशों में स्टेशन पर  रेलगाड़ी का इंतजार करना बहुत थकाने वाला और उबाऊ होता है, लेकिन हिंदुस्तान में इस तरह का कोई अहसास नहीं होता। यहां के स्टेशनों पर भारी चहल-पहल और शोरगुल रहता है। आभूषण पहने नर नारियों की भीड़ नजर आती है, उनकी बहुरंगी वेशभूषा और परिधानों को देखकर मन जितना आनंदित होता है, उसे शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता।”

ट्वेन ने अपने यात्रा अनुभवों से अपनी डायरियों और नोटबुकों को भर लिया था। यहां के लोगों के बारे में एक जगह वे लिखते हैं कि यहां मलीन मन के व्यक्ति भी हैं, लेकिन मेरा विश्वास है कि वे बहुत कम हैं। एक बार निश्चित है कि वे दुनिया के सबसे दिलचस्प लोगों में हैं, जिन्हें समझना  और उनकी शख्सियत को पूरी तरह पकड़ पाना लगभग मुश्किल है।  ट्वेन को हिंदुस्तान के सुंदर दृश्यों बहुत प्रभावित किया था। यहां की महिलाओं की छरहरी सुगठित देह, उनके सांचे में ढले हुए अंग, तराशे हुए हाथ और पैर। वहां के महाराजाओं और शहजादों की भव्य पोशाक और उनके हृदयग्राही रंगों ने उसके मन को मोह लिया था। किंतु इसके साथ ही यहां की जमीनी हकीकतों से ज्यों-ज्यों उनका वास्ता पड़ा, उनकी अनुभूतियों और व्यंजनाओं में अतविरोध की झलक मिलने लगी।                                                    (मार्क ट्वेन का जीवन परिचय)

एक पर्वतारोही की तरह उतार-चढ़ाव से गुजरते हुए कभी उन्होंने यहां के लोगों की बीमारियों के बारे में लिखा तो कभी उनके हट्टे-कट्टे बदन के बारे में, कभी आनंद और आमोद-प्रमोद के बारे में तो कभी शोक और विषाद के बारे में, कभी विपत्ति के बारे में तो कभी वैभव के बारे में। किंतु इस तरह के विवरणों में भी वे अपने हास्य का पुट देने से नहीं चूके। पहली बार मुंबई के एक होटल के तकिये के इस्तेमाल से उन्हें जो तजुर्बा हुआ, उसका जिक्र करते हुए वे लिखते हैं  ‘‘युद्ध के समय हिंदुस्तान में जो जिरह बख्तर बनते होंगे, वे होटल के तकियों से बने होंगे।”                                (मार्क ट्वेन का जीवन परिचय)

मार्क ट्वेन का जीवन परिचय

मार्क ट्वेन (Mark Twain) के अनमोल विचार

  •  अगर आप एक भूखे कुत्ते को पकड़ लाएं और उसे खिला-पिलाकर सब प्रकार संपन्न बना दें, तो वह आपको काटेगा नहीं। कुत्ते और आदमी में यही बड़ा अंतर है।
  • अगर आप सच बोलें तो आपको कुछ भी याद रखने की आवश्यकता नहीं होती है।
  • धर्म और राजनीति में लोगों की आस्थाएं और मान्यताएं प्राय: दूसरे लोगों से बिना किसी पड़ताल के ग्रहण की गई होती हैं।
  • यह बेहतर है कि आप अपने मुंह को बंद रखें और लोगों को यह सोचने दें कि आप एक मूर्ख हैं, बजाय इसके कि आप उसको खोलें और आपके बारे में सारे संदेह ही समाप्त हो जाएं
  • यह बड़ी विचित्र बात है कि शारीरिक साहस तो सहज सुलभ है किंतु नैतिक साहस दुर्लभ है।
  • ऐसे लोगों से दूर रहें जो आपकी महत्वाकांक्षा को क्षीण करते हैं। ओछे लोग ही ऐसा करते हैं। जो सचमुच बड़े होते हैं वे आपको यह अहसास कराते हैं कि आप भी बड़े बन सकते हैं।
  • अधिकांश लोग शास्त्रों के उन अंशों से परेशान रहते हैं, जिन्हें वे बिल्कुल नहीं समझते किंतु मुझे वे अंश परेशान करते हैं, जिन्हें मैं समझता हूं।
  • मानव जाति के पास एक ही वास्तविक रूप से प्रभावी अस्त्र है, और वह है उसकी हंसी। सही शब्द बहुत प्रभावी हो सकता है, किंतु कोई भी शब्द उतना प्रभावी नहीं होता जितना कि सही समय पर प्रयुक्त किया गया विराम।
  • सबसे बड़ा अकेलापन अपने साथ सहज न होना है।
  • ऐसे लोग हैं जो बड़ी कड़ाई के साथ अपने को हर खाद्य पदार्थ से, हर पेय से और अपने भीतर धुआं लेने वाले पदार्थों और ऐसी हर वस्तु से जिन्हें बुरा समझा जाता है, अपने आपको वंचित रखते हैं, वह यह कीमत स्वास्थ्य के लिए अदा करते हैं और मात्र स्वास्थ्य ही वह वस्तु है, जिसे वे प्राप्त करते हैं। कैसी विचित्र बात है? यह तो कुछ ऐसा ही है, जैसे आप सारी संपत्ति उस गाय के लिए लुटा दें जो दुधारू नहीं रही है।
  • जब मैं युवा था तो हर बात को याद रख सकता था चाहे वह घटित हुई हो या नहीं।
  • जब कभी आपको लगे कि आप बहुमत के साथ हैं, तो यह आपको अपने आपको सुधारने का समय है।
  • हिंदुस्तान में 20 लाख देवी-देवता हैं, जिनकी सभी लोग पूजा भी करते हैं। धर्म के मामले में अन्य सभी देश दरिद्र ही हैं, जबकि हिंदुस्तान लखपति है।
  • प्रत्येक दिन आप कुछ ऐसा करें जो करना नहीं चाहते। यह एक ऐसा स्वर्णिम नियम है, जिससे आप अपने कर्तव्य को बिना किसी कष्ट के निभाने की आदत डाल सकते हैं।
  • अपनी भ्रांतियों को दूर मत कीजिए, यदि वे चली गईं तो आपका वजूद तो रहेगा, लेकिन आपका जीना मुश्किल हो जाएगा।
  • पहले अपने तथ्यों को प्राप्त कीजिए और फिर आप जैसा भी चाहें, उनको तोड़ मरोड सकेंगे।
  • दुख तो अपने आप से निपट लेगा, लेकिन सुख का पूरा मजा लेने के लिए जरूरी है कि उसमें कोई साझा करने वाला हो।
  • ईमानदारी सर्वश्रेष्ठ नीति है, जब आपके पास पर्याप्त पैसा हो।
  • हास्य बहुत बड़ी चीज है, जिस समय इसका प्रस्फुटन होता है, हमारा सारा  चिड़चिड़ापन और गुस्सा दूर हो जाता है और उसकी जगह उत्फुल्लता का संचरण होने लगता है। ।
  • जार्ज वाशिंगटन के मुकाबले मेरे सिद्धान्त ज्यादा बड़े और ऊंचे हैं, वे झूठ नहीं बोल सकते थे मैं बोल सकता हूं, पर मैं ऐसा नहीं करूंगा।
  • मैं अपनी स्कूली रटन्त को अपनी शिक्षा पर हावी नहीं होने दूंगा।
  • मैंने कभी कोई व्यायाम नहीं किया, सिवाय सोने और आराम करने के।
  • कोई भी व्यक्ति बिना अपनी स्वयं की आत्म-स्वीकृति के सुखी नहीं हो सकता।
  • एक अंग्रेज वह है, जो बहुत सारी बातें इसलिए करता है कि उसके पुरखे उससे पहल करते रहे हैं। एक अमेरिकी वह है जो वह करता है, जैसा पहले कभी नहीं हुआ।

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(मार्क ट्वेन का जीवन परिचय)

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