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जिंदगी जीने के लिए ...
मौत का डर कैसे दूर करें

मौत का डर कैसे दूर करें ? – मौत से मुकाबला

क्सर ये देखा गया है कि हम पूरी तन्मयता से हमारी छोटी सी जिंदगी को जी नहीं पाते। हमारी अधूरी आकांक्षाएं मृत्यु को दुखदायी बनाती हैं , गर पूरी ताकत से जिंदगी जी जाए तो मृत्यु हममें से लेकर जाएगी क्या? अगर जन्म ईश्वर का उपहार है तो मृत्यु को महा उपहार माना जाना चाहिए। अगर जन्मोत्सव है तो मृत्यु को भी एक महा उत्सव ही माना  चाहिए। आये आज इस अंक में बात करते हैं कि हम मौत का डर कैसे दूर करें ? – और मौत से मुकाबला कैसे करें

मौत के बिना मोक्ष सम्भव नहीं

मार्क ट्वेन ने लिखा है कि ‘संसार में सबसे अधिक खतरनाक स्थान बिस्तर है क्यूंकि  सबसे अधिक लोग बिस्तर में ही मरते हैं।’ सवाल यह नहीं है कि कौन कहां मरता है। परन्तु बड़ा सवाल यह है कि मृत्यु से मिलन के समय हमारा दृष्टिकोण एवं व्यवहार क्या रहता है। मृत्यु मनुष्य की सबसे उत्तम मित्र है। यह पैदा होने एवं जीवन की अनिवार्य शर्त है। यदि हमें स्वर्ग जाना है तो भी मरना तो पड़ेगा। यहां तक कि यदि हम जीवन-मरण के चक्र से मुक्त हो ‘लक्ष्य प्राप्ति’ के अभिलाषी हैं तो भी जीते जी मोक्ष प्राप्ति की कोई स्थिति नहीं है। मरण के द्वार से ही अमृत की प्राप्ति है। जीते जी तो अमृत भी नहीं है।

हम मृत्यु से मिलकर कितने प्रसन्न होते हैं। उसका स्वागत कैसे करते हैं। मृत्यु हमें परिभाषित करती है। जीवन नहीं कर पाता। जीवन तो स्वर्णिम मोहक आडंबरों को ढोता फिरता है। वास्तव में आत्म साक्षात्कार का भी और कोई अर्थ नहीं है- स्वयं की मौत का साक्षात् दर्शन करना है। मोक्ष यानी ममत्व की भावना का क्षय-यही अर्थ इंगित करता है। यह बिना मृत्यु से गुजरे अनुभव नहीं किया जा सकता। ईश्वर का साक्षात्कार भी बिना मृत्यु कैसे संभव है।

मौत से डरना कैसा

दारा शिकोह का गुरु समद औरंगजेब का कोप भाजन बन गया। उसका सिर काटने जब जामा मस्जिद लाया गया उसे मुल्लाओं ने कहा-कहो अल्ला है- उसने कहा मैं अल्लाह कह सकता हूं। वह है या नहीं, नहीं कह सकता। मुझे उसका अनुभव नहीं। जब होगा तभी कहूंगा। यह वाक्य वह सारी जिंदगी दोहराता रहा। इसके कारण उसे काफिर कहा गया। दारा शिकोह जो औरंगजेब का भाई था तथा जिसे शाहजहां ने सम्राट घोषित कर दिया था उसे भी औरंगजेब व उसके मुल्ला काफिर कहते रहे। दारा शिकोह संस्कृत तथा उपनिषदों का विद्वान था। उसने उपनिषदों का फारसी में अनुवाद करवाया जो फारस से यूरोप पहुंचे व आज भी वे उपनिषद के प्रामाणिक अनुवाद यूरोप में माने जाते हैं। जब समद का सिर काटा गया, उसके कटे सिर ने कहा ‘अल्लाह है।’ जीते जी उसने नहीं कहा।                                                       (मौत का डर कैसे दूर करें ?)

जब तक जियें खुल के जियें

सूली पर ईसा मसीह ने पीड़ा व अपमान से भरकर ईश्वर को गुहार लगाई। मेरे परमात्मा। क्या यही सब दिन दिखाने के लिए तूने मुझे पैदा किया था। एक इंसान का उन अव्यवस्थाओं में विचलित हो जाना स्वाभाविक है। वहां केवल मौत अकेली नहीं थी। घोर अपमान एवं व्यंग्य के बाण चल रहे थे। उन्हें यहूदी पुजारियों ने कहा ‘अब देखें। तुम्हारा पिता तुम्हें कैसे बचाता है।’ उनके सिर पर कांटों का ताज रखा गया। यह उनके राजा होने का राज्याभिषेक था। लोग नाच रहे थे, गा रहे थे। बाद में उन्होंने कहा ‘मेरे पिता। इन्हें क्षमा करना। इन्हें पता नहीं। ये क्या कर रहे हैं।’ मृत्यु कैसे प्रकाशमान होती है, यह ईसा के उदाहरण से समझा जा सकता है।

मौत का नजारा ऐसा भी

मौत से इतिहास में श्रेष्ठतम मुकाबला साक्रेटीज ने किया है। प्लेटो ने रिपब्लिक में इसका पूरा वर्णन मर्मस्पर्शी ढंग से किया है। सुकरात ने दर्शन की परिभाषा ही मृत्यु से जोड़कर की है। उसने कहा दर्शन मृत्यु की कला है। जब उसके न्यायाधीशों ने उसे कहा ‘सुकरात अब मरने के लिए तैयार हो जाओ।’ उसने आदरणीय न्यायाधीशों, और मैं सारे जीवन क्या करता रहा ! जेल का वह दृश्य जब सायंकाल का समय है। जल्लाद ज़हर का प्याला तैयार कर रहा है। उसके शिष्यों ने कहा- गुरुदेव। आपको यहां से सुरक्षित भगाने के सारे इंतजाम हो गए हैं। हमने रक्षकों को घूस दे दी है। आप चाहें तो हम यहां से निकल कर चुपचाप जा सकते हैं। सुकरात ने  कहा- नहीं। यह हर्गिज नहीं हो सकता। इसका अर्थ यह होगा कि मैं देश के कानून एवं न्याय की इज्जत नहीं करता। मैं मरना पसंद करूंगा। उसके शिष्य वहीं थे, सुकरात ने जल्लाद से पूछा और कितनी देर है। तैयार है गुरुवर। हमें क्या करना होगा। आप इसे शांति से पी लें व थोड़ी देर कमरे में चहल कदमी करते रहें। इससे ज़हर शरीर में फैल जाएगा व मृत्यु आसान होगी।

संध्या समय पक्षी अपने नीड़ों में लौट रहे हैं। शिष्य रोने लगे। रोने की क्या बात है। खुश होओ कि आज मुझे अपनी बात प्रमाणित करने का अवसर मिला है। एक शिष्य ने पूछा आपके बाद हम आपकी स्मृति कैसे बनाए रखें? हम आपकी एक मूर्ति बनाएंगे। सुकरात ने कहा, सारा जीवन मेरे पास ज्ञान अर्जन के बाद भी पकड़ रहे हो तो मेरा शरीर। मेरी शिक्षा को पकड़ो। शरीर का क्या है, उससे क्या प्रेम करना। उसने अपने एक शिष्य से मरते समय कहा “याद रखना हमें ग्रीक देवता को एक मुर्गा वापस देना है। मेरे बाद उसे मुर्गा दे आना।”  सुकरात के जब प्राण जा रहे थे ऐसा लग रहा था मानो उसका अंग-अंग मृत्यु को प्यार से गले लगा रहा है। इतनी शानदार मौत विश्व इतिहास में किसी दूसरे को नसीब नहीं हुई।

प्लेटो की कलम ने सुकरात की मौत को चार चांद लगा दिए। उसने सिद्ध किया कि मृत्यु एकदम तुच्छ एवं छोटी सी वस्तु है। जो कुछ है मृत्यु से पहले है। सुकरात की परंपरा में रोमन दार्शनिक सैनिकों को नीरो ने अपने राज दरबार में नस काटकर बूंद-बूंद खून बहने से होने वाली भयानक सजा दी। सैनिक अपने समय का श्रेष्ठतम वक्ता था। वह दुर्भाग्य से नीरो का गुरु भी था। उसे राजगद्दी दिलवाने में नीरो की मां के साथ उसने भी बहुत प्रयास किए थे। सम्राट नीरो को शक हो गया कि राजगुरु उसके खिलाफ षड्यंत्र कर रहे हैं। सैनिकों ने घर जाकर परिवार से विदा लेना चाहा। नीरो ने इसकी इजाजत भी नहीं दी। सैनिकों ने कहा” दर्शन की पुस्तकें मंगवा दो। उन्हें पढ़ता हुआ मरना मुझे अच्छा लगेगा” उसकी वह प्रार्थना भी ठुकरा दी गई। उसने अपने शिष्यों को बुलाकर कहा “आ जाओ। हम दर्शन पर यहीं चर्चा करेंगे। इससे अच्छा अवसर क्या होगा।” उसने अपने हाथ की नस काटी खून बहने लगा। वह अपने शिष्यों से घिरा हुआ दर्शन पर चर्चा कर बूंद दर बूंद मृत्यु की तरफ शांत भाव से बढ़ता गया। दर्शन या किसी भी विषय का ऐसा शिक्षण, संसार में फिर संभव नहीं हो पाया। लोग अंतिम सांस तक भी मजाक से भरे रहे।

मौत का फोबीया दिल से निकालें

लॉर्ड पामेस्टन को उनके डॉक्टर ने कहा, ‘देखिए लॉर्ड। यदि आप मेरी सलाहनुसार नहीं चले तो आप मर जाएंगे। लॉर्ड ने कहा, देखिए डॉक्टर। मरना एक ऐसी चीज है जिसे मैं अंतिम काम के बतौर शायद करना पसंद करूंगा। जॉन होम्स अमेरिकन दार्शनिक मृत्यु शैया पर थे। ऐसा लग रहा था कि मानो उनका अंत हो गया हो। उनकी नर्स ने चादर के भीतर उपजे पांवों पर हाथ फेरा। पांव गर्म थे। नर्स ने कहा, नहीं। जॉन होम्स जिन्दा हैं। गर्म पांव से आज तक कोई नहीं मरा है। जॉन होम्स ने कहा, नहीं सिस्टर। जॉन रोजर गर्म पांवों से मरा। सन 1555 में जॉन रोजर को जिंदा जलाया गया था।                                                  (मौत का डर कैसे दूर करें ?)

जो मर कर भी अमर हो गए

सर थामस मूर को राजद्रोह के अपराध में मृत्युदंड दिया गया था। उनका सिर काटा जाना था। जब जल्लाद कुल्हाड़ी चलाने को था। मूर ने उसे रोका और बोलै “थोड़ा सा रुकना। जरा दाढ़ी हटा लूं। अपराध सिर का था दाढ़ी बेचारी बेकसूर है।” उन्होंने दाढ़ी हटाई। इसके तत्काल बाद जल्लाद ने उनका सिर उड़ा दिया।

सर वाल्टर रेले प्रसिद्ध कवि भी थे। राजा के मित्र थे मगर शंका में उनका भी सिर काटने की आज्ञा हो गई। उस समय वे बुखार से पीड़ित थे। उन्होंने जल्लाद की कुल्हाड़ी की धार को परखा ‘यह अच्छी धारदार दवाई है। यह सारी बीमारियों की रामबाण दवा है।’ फ्रांस में क्रांति के बाद महारानी मेरी एन्टोनायनैट को जब जल्लादों के सामने लाया गया। उसने गलती से अपना एक पैर किसी जल्लाद पर रख दिया। तत्काल महारानी ने क्षमा मांगी- ‘क्षमा करना महाशय। मैंने भूलवश पांव पांव रख दिया। यह जान-बूझकर नहीं किया गया था।’ मरने से कुछ क्षण पहले अपने जल्लाद प्रति ऐसी विनम्रता से सबका दिल पसीज गया।

रूसी क्रांतिकारी माइकल बेरटजेब रिवमिन वजन में ज्यादा थे। फांसी लगने से पूर्व उन्होंने जल्लाद से कहा  ‘देखना मेरा शरीर भारी है। रस्सी ठीक ठाक है।’ जल्लाद ने कहा ‘आप चिंता न करें। जब उन्हें फांसी पर लटकाया गया रस्सी टूट गई।’ अति दुख भरे स्वर में उन्होंने जल्लाद से कहा ‘देखो। मैंने पहले ही कहा था। पता नहीं मेरा भाग्य क्या है। मैं हर बार पहले प्रयास में नाकाम भी आखिर वही हुआ। मेरे साथ कुछ भी पहले प्रयास में सफल नहीं होता कभी भी।’                                                  (मौत का डर कैसे दूर करें ?)

श्रेष्ठतम प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल की मृत्यु शैया पर बाइबल लिए पादरी ने पूछा  ‘क्या से मिलने को तैयार हैं। उन्होंने कहा, मैं तो तैयार हूं पर क्या वह भी मुझसे मिलने  को तैयार हैं। हैनेरिच को उसके पादरी ने कहा, ईश्वर तुम्हारे पाप माफ कर देगा। हैनेरिच ने कहा। यही उसका व्यवसाय है। वरना करेगा क्या।’ हैनेरी फॉक्स हॉलैंड के एक प्रसिद्ध व्यक्ति थे। मरते समय उन्होंने नौकरों को हिदायत दी यदि श्री सेलविन मुझसे मिलने आते हैं तो उन्हें आने देना। यदि तब तक मैं जीवित रहा तो मुझे उनसे मिलकर बेहद खुशी होगी और यदि मैं मर गया तो उन्हें मुझसे मिलकर प्रसन्नता होगी।

स्कॉटलैंड की खूबसूरत महारानी ऐन ने जल्लादों से कहा, लगता है तुम अपने काम में निपुण हो। यह याद रखना कि मेरी गर्दन पतली है। कुल्हाड़ी चलाने में हाथों को ठीक से विश्वास से भरकर चलाना। तुम्हारा विश्वास डगमगाना नहीं चाहिए।

फ्रेंच क्रांति का एक नायक जेनस डॉनटन जब गिलौटिन पर सिर कटवाने लाया गया उसने जल्लादों से कहा, ‘मेरा सिर काटने के बाद उसे लोगों को दिखाना जरूर। इतना अच्छा कटा सिर उन्होंने कई दिनों से देखा नहीं होगा।’ इन घटनाओं को विराम देने के पूर्व एक बार हम फिर सर वाल्टर रेले की तरफ जाएंगे। सिर काटने के पहले राजा के अधिकारियों ने उन्हें कहा- आपका सिर सही दिशा में नहीं है। उसे बदल लीजिए। उन्होंने मय चौखट अपना सिर उसी तरफ कर लिया जिधर राज्याधिकारी चाहते थे। फिर कहा ‘सिर कहां है यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना यह तथ्य कि किसी का दिल कहां है।’

जिंदगी जिन्दा दिली का नाम है

ऐसे दर्जनों और भी उदाहरण जो पेश किए जा सकते हैं। ये सारे उदाहरण बतलाते हैं कि मृत्यु गंभीरता से लेने लायक विषय नहीं है। अगर जन्म ईश्वर का उपहार है तो मृत्यु महा उपहार माना जाना चाहिए। अगर जन्मोत्सव है तो मृत्यु को भी एक महाउत्सव ही माना जाना चाहिए। मगर यह दृष्टि विकसित करने में बड़ा प्रयास करना होगा। जीवन को हमें सर्व संस्कारों एवं मान्यताओं से मुक्त करना होगा। मृत्यु महानंद है। उसे मरकर ही उठाया जा सकता है।                                                  (मौत का डर कैसे दूर करें ?)

परमात्मा के जगत में दुख की रचना परमात्मा की नहीं। हमारी अपनी है। अगर परमात्मा सुख का ही रचयिता है तो मृत्यु भी परम सुख के अलावा क्या हो सकती है। दरअसल भयभीत लोग केवल मृत्यु से ही नहीं, जीवन से भी, दुखों से ही नहीं, अपने परम सुखों से भयभीत रहते हैं। इस कारण हमारी सिर्फ सांसों का तार टूटता है। उसमें कोई कलात्मकता नहीं, कोई सौंदर्य का सृजन नहीं हो पाता। हम दृष्टि विहीन हैं। सारी खराबी वहां है। वर्ना हममें से अनेक मरते समय भी उतने ही जिंदा दिल रह सकते हैं जैसे वे जीवन में रहते हैं ।।

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