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सत्य के कितने सिद्धांत हैं

सत्य के कितने सिद्धांत हैं – सच को परखने के सिद्धांत

कोई घटना या विचार सत्य है ? या असत्य ? या अगर वह सत्य भी है तो उसकी वजहें क्या हैं, इन पर दार्शनिक अपने तरीके से विचार करते रहे हैं इस लेख में हम जानते हैं कि दार्शनिक लोगों के अनुसार सत्य के कितने सिद्धांत हैं और  सच को परखने के सिद्धांत कौन कौन से हैं ।

सादृश्य सिद्धांत

किसी भी वास्तविकता को कोई सच कितना करीब से और किस हद तक समझा पाता है इसी में उसकी सार्थकता निहित है साथ ही किसी भी भाषा का अनुवाद उसके सारे अर्थ को पकड़ नहीं पाता तो सच के निर्माण में भाषा भी एक कारक है।

सुसंगतता सिद्धांत

सच पूर्णता से कितने हद तक सुसंगत है। इसी आधार पर उसकी प्रामाणिकता मापी जा सकती है। कई तार्किक दार्शनिक जैसे स्पिनोज लाइनिज जीडब्ल्यूएफ हेगल और ब्रिटिश दार्शनिक एफएच बेडले ने इसी सिद्धांत की अनुपालना की है।

संरचनावादी सिद्धांत

सत्य सामाजिक प्रक्रियाओं से सत्य निर्मित होता है। सत्य की संरचना हमारी अनेक वास्तविकताओं जैसे जाति, समाज, लिंग के आधार पर होती है। हमारे समुदायों में कई तरह के शक्तिमता युद्ध होते हैं यानी ताकत के लिए लड़ाइयां होतीं हैं। इसी के अनुसार कई स्थितियों में सत्य का निर्माण होता है। हेगले और मार्क्स ने इस सिद्धांत को सच माना।

परिणामवादी सिद्धांत

यह सिद्धांत 20वीं सदी की शुरुआत में चार्ल्स पीयर्स, विलियम जेम्स और जॉन ड्यूई ने दिया। उनके अपने दृष्टिकोणों में आपस में अनेक विवाद थे फिर भी यह माना गया कि जब तक सत्य को कई कसौटियों पर परखा और तोला नहीं जाता उसे सही नहीं ठहराया जा सकता है। पीयर्स ने कहा अपूर्णता और अनुमान सत्य तक पहुंचने के लिए जरूरी रास्ते हैं।

सर्वसम्मति सिद्धांत

जुर्गेन हेबरमास ने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया अगर किसी तथ्य पर सर्वसम्मति हो जाती है तो वह सत्य माना जा सकता है।

अर्थहीनता सिद्धांत

विद्वानों ने माना कि सत्य का बार-बार उल्लेख नहीं किया जाना चाहिए। तथ्य अपने आप में ही संपूर्ण और सत्य होना चाहिए। उसके लिए यह कहा जाना कि यह सत्य है। वास्तव में अर्थहीन है। यह विचार मुख्यतया फ्रैंक पी. रामसे का है।                                     सत्य के कितने सिद्धांत हैं

प्रस्तुतिकरण सिद्धांत

पीएफ स्ट्रॉसन ने यह विचार दिया और कहा कि कोई भी वाक्य जैसे बर्फ सफेद होती है। केवल वाक्य नहीं है, बल्कि सत्य का प्रस्तुतिकरण है। एक तरह से यह एक तथ्य की व्याख्या है।

क्रिप्के सिद्धांत

क्रिप्के यह मानते हैं कि कुछ वाक्य न तो सच होते हैं न झूठ और इस तरह से यह मानना कि हर वाक्य या तो सच होता है या झूठ, गलत साबित होता है यानी क्रिप्के ने झूठ के वजूद को अपनी तार्किक क्षमता से नकार दिया है।

अर्थतत्व सिद्धांत

सच किसी भी भाषा में पूरी तरह नहीं पहचाना जा सकता, क्योंकि उस भाषा में सत्य को व्यक्त करने की ताकत नहीं होती। विख्यात लेखक बट्रेंड रसैल इस विचार को मानते थे।

अन्य सिद्धांत

प्लेटो और अरस्तू के सिद्धांत बहुत सीमा तक सादृश्य सिद्धांत के निकट हैं। इम्मानुअल कांट ने सादृश्य सिद्धांत की और भी स्पष्ट व्याख्या की है। कीर्केगार्ड सत्य को बेहद विषयनिष्ठ मानते हैं। वे कहते हैं कि विषयनिष्ठ सत्य ही सतत और जीवंत होते हैं और वह फिर से परिष्कृत और परिमार्जित होते रहते हैं। नीत्शे ने कहा कि असत्य ही सत्य से बेहतर है, अगर वह जीवनदायी है तो वह सत्य की सत्ता से ज्यादा प्रभावी है। हाइडेगर सत्य की महिमा को नजरअंदाज करते हैं और कहते हैं कि यह केवल कुछ विशेषणों, वादों और भाषा प्रयोगों का विस्तार भर है। नील्स बोहर नामक वैज्ञानिक जो कि अणु की संरचना के विषय में महत्वपूर्ण शोध के लिए जाने जाते हैं, कहते हैं कि सत्य या कि पूर्ण सत्य का विपरीत भी सत्य ही होता है ।

  • आध्यात्मिक विषय निष्ठता हमारे अपने निर्णय और आस्थाओं पर यह तय करती है कि कोई विचार सत्य है या नहीं, जबकि आध्यात्मिक वस्तु निष्ठता सत्य के निर्धारण के लिए किसी पूर्व आधारित विश्वास का सहारा नहीं लेती ।
  • सापेक्षिक सत्य हमारी अपनी नजर और संस्कृति के आधारों पर निर्मित होते हैं।
  • पूर्ण सत्य का अस्तित्व भ्रमपूर्ण है धार्मिक परंपराओं में पूर्ण सत्य भिन्न तरीके से जाना जाता है, जबकि दर्शन में उसकी परंपरा दूसरी होती है।
  • एक तरह का सत्य वह अर्द्ध सत्य होता है जो सापेक्षिक भी है और पूर्ण भी। वह एक विराट सत्य का हिस्सा है।
  • विधिशास्त्र में सत्य एक बुनियादी मुद्दा है, वह साक्ष्य और गवाहों की ईमानदारी पर आधारित होता है। तथ्यों के प्रस्तुतकर्ताओं पर यह जिम्मेदारी होती है जो इसकी सत्यता निर्धारित करें। परिभाषा के अनुसार ‘तथ्य’ शब्द पर ब्लैक कानून शब्दकोश में पूरे दो पेज दिए गए हैं जिसमें तीन मुख्य अर्थ और 42 परिभाषाएं शामिल हैं। ‘साक्ष्य’ शब्द के लिए पूरे 5 पेज दिए गए हैं जिसमें चार मुख्य सत्य और 93 परिभाषाएं हैं। बचाव के मुकदमें से लेकर मानहानि के मामलों तक सत्य को एक कानूनी शब्द के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है। सत्य शब्द का प्रयोग कानूनी मामलों में शायद ही कभी किया जाता है न ही आधिकारिक तौर पर अदालतों, जजों को सत्य के अन्वेषक के रूप में कहा जाता है। आधारों पर निर्मित होते हैं या परंपराओं पर या फिर वह उन दोनों का
  • धर्म में सत्य आध्यात्मिक समन्वय भी हो सकते हैं। बौद्ध धर्म में चार आर्य सत्य माने गए हैं : –  1. जीवन दुख है। 2. दुख का कारण इच्छाएं हैं। 3. इन दुखों के निवारण भी हैं। 4. इन निवारणों के लिए अष्टांगिक मार्ग है।                                        सत्य के कितने सिद्धांत हैं
  • ईसाइयत में बाइबिल सत्य और आस्था की केन्द्र है। पोप को रोम कैथोलिक समुदाय प्रश्नांकित नहीं करता है। ईसाई धर्म के केन्द्रीय व्यक्ति जीसस ने स्वयं को सत्य का पर्याय बताया और कहा कि मैं ही सत्य हूं।
  • बाइबिल का अंतिम सत्य होना- बाइबिल जो कि पवित्र है और उसमें किसी प्रकार की कोई गलती नहीं है । यह माना जाता है कि आस्था के विषयों पर बाइबिल सही है ।
  • दोहरा सत्य – 13वीं शताब्दी के रोमन कैथोलिक चर्च ने दोहरे सत्य के विचार को गलत ठहराया। यह दोहरा सत्य होना दोनों ही तर्क और आस्था पर निर्भर करता है। यह चर्च का कदम अरस्तू का विरोध करने के लिए था, क्योंकि अरस्तू आस्था को चुनौती देते थे और सत्य को तार्किक आधारों पर निर्धारित करते थे। अरस्तू के क्रांतिकारी विचार पढ़े-लिखे लैटिन समाज में प्रवेश कर चुके थे और वह रोमन चर्च की आलोचना करते प्रतीत होते थे।
  • सत्य हिंदुत्व में धर्म के दस प्रकारों में से एक है।
  • जैन धर्म में सत्य की कसौटी अनेकान्तवाद है यानी हर विचार के कई पहलू हैं, अनेकान्तवाद सत्य की कई सारी सीमाओं के पहलुओं पर विवेचना करता है ।

 गणित का सत्य

19वीं शताब्दी में बूलियन अलजेब्रा के प्रारंभ के साथ ही सत्य को 1 माना गया और असत्य को शून्य । गणितीय तर्क के अनुसार एक और शून्य चिह्नों के प्रयोग द्वारा इनका तय अर्थ प्रस्तुत किया जा सकता है बाद में जब कम्प्यूटर ईजाद हुए तो कम्प्यूटरों का समूचा सिद्धांत 0 और 1 की प्रयोगात्मकता पर निर्भर हो गया यानी आज का सारा कम्प्यूटर जगत 1 और 0 वाले इस सत्य और असत्य के बूलियन अलजेब्रा का शुक्र गुजार है। बाद में एक समस्या गणितज्ञों के सामने आई जिसमें दो उदाहरण जो कि हिल्बर्ट की समीक्षाओं से लिए गए थे सत्य थे, क्योंकि उनके गणितीय समीकरण स्पष्ट थे, लेकिन फिर भी वह प्रमाणित नहीं किए जा सकते थे ।।

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