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अपने आप को कैसे परखें

अपने आप को कैसे परखें – स्वयं को समझना

म दुनिया को तो अपने नजरिये से देख लेते हैं लेकिन अक्सर अपने आप को अंदर से नहीं झाँक पाते इसकी क्या वजह हैं ? आगे हम यह भी  जानने का प्रयास करते हैं कि हम अपने आप को कैसे परखें और  स्वयं को समझना क्या होता है ? इसे जाने के लिए हमें नीचे वर्णित किस्से को समझना होगा ।

दुनियां  के सात अजूबे (आश्चर्य)

क कक्षा में एक टीचर ने बच्चों से दुनिया के सात अजूबों (आश्चर्यों) की सूची बनाने को कहा। बच्चों की सूचियां देखने के बाद करीब-करीब वही नाम सामने आए मसलन मिस्र के पिरामिड, चीन की दीवार, एम्पायर स्टेट बिल्डिंग। किसी ने ताजमहल भी लिखा तो किसी ने पनामा केनाल। एक बच्ची ने अपनी सूची नहीं दी। पूछने पर बोली “इतने सारे आश्चर्य हैं कि मुझे समझ ही नहीं आ रहा है क्या लिखू, क्या छोडूं” हिचकिचाते हुए उसने अपने सात आश्चर्य दिखाए :-

  1.   देखना 
  2. सुनना 
  3.  छूना 
  4.  महसूस करना 
  5.  हंसना 
  6. रोना
  7. अपने आप को प्यार करना

लेकिन ये सात आचार्य कैसे हो सकते हैं । इसे जानने के लिए हम विस्तार से  इस प्रसंग से  रूबरू होने के लिए आइए अपने नजरिए से इसके विस्तार में जाकर देखते हैं ।

I- देखना

इस दुनिया को देख पाना एक सुखद आश्चर्य है। ईश्वर जिन्होंने विविधता से भरी ये दुनिया रची है, उन्होंने ही हमें देखने की शक्ति दी है। हम हिमालय की उँचाई को हत प्रभ होकर देख सकते हैं, हम ताज महल की खूबसूरती को निहार सकते हैं, हम सड़क पर पड़े कचरे को भी देखते हैं। पर हमारे पास अपने भीतर झांकने की शक्ति भी है जिससे हमें अपने भीतर मौजूद असीमित संभावनाएं दिखती हैं, अपने भीतर छुपी उमंग दिखती है जो इस दुनिया को और खूबसूरत बना सके। बरसात के मौसम में हम अक्सर देखते हैं कि सूरज बादलों के पीछे छिप गया है । क्या ऐसा हो सकता है? कहा गया है धनच्छन्नदृष्टि घनच्छन्नमर्कष्ट। जिसकी दृष्टि को बादल ने ढंक लिया है, उसे सूरज बादल से ढंका दिख रहा है। ऐसे ही कई भ्रम हमारे जीवन का हिस्सा होते हैं । होता कुछ है, हम देखते कुछ और हैं। इसलिए कभी कभी फुरसत में अपने अंदर भी झांके जिससे आपको अपने आप को समझने में मदद मिलेगी ।

II- सुनना

हमारे पास सुनने की अद्भुत क्षमता है, हम बादलों का अट्ठास सुन सकते हैं तो चिड़ियों का कलरव भी सुन सकते हैं । हम दुनिया की भी सुन सकते हैं और अपने मन की भी। दो बुजुर्ग सुबह की सैर पर मिले। दोनों बतियाते हुए जा रहे थे। अचानक एक ने कहा, ”जरा रुको मुझे कुछ सुनाई दे रहा है।” वे पीछे मुड़े। वहां एक झाड़ी में फंसी तितली फड़फड़ा रही थी। उन्होंने झाड़ी को हिलाया और तितली उड़ गई। दूसरे बुजुर्ग को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा “कमाल है, इस भीड़ भरी सड़क पर तुम्हे तितली की फड़ फड़ाहट कैसे सुनाई दी?” बुजुर्ग मुस्कुराए और बोले “ हमें वही सुनाई देता है जो हम सुनना चाहते हैं।” उन्होंने इसे समझाने के लिए एक पांच रुपए का सिक्का जेब से निकाला और सड़क पर गिरा दिया। आसपास, चलने वाले सभी लोग ठिठके और सिक्के की तरफ देखने लगे। सड़क पर भीड़ और शोर उतना ही था। यकीनन, हमें हमेशा वही सुनाई देगा, जो हम सुनना चाहेंगे। इसलिए आप अपने मन कि सुन कर अपने आप को समझ सकते हैं ।                                                                                                                                  (अपने आप को कैसे परखें)

III- छूना

मां का स्पर्श एक शिशु को कवच के समान लगता है, एक विद्यार्थी की शाबाशी में ठोंकी गई पीठ उसके लिए नई ऊर्जा का काम करती है, ढाढ़स बंधाने के लिए कंधे पर रखा गया हाथ दुःख में भी खुशी के आंसू निकाल देता है कि हमारे साथ कोई है। हम किसी के भी मन को छू सकते हैं और दानव बने तो अनर्थ कर सकते हैं और छुअन, स्पर्श का नया नाम “टच थैरेपी’उपचार का तरीका बन गया है। आप जब भी फुरसत में हो तो अपने आप को स्पर्श कीजिये इससे आप बेहतर ढंग से अपने आप को परख पाएंगे ।

IV- महसूस करना

मानवीय दुनिया का सर्वोत्तम आश्चर्य है हमारी अनुभूति की क्षमता जो खारे पानी को आंसू बनाती है, भौगोलिक सीमाओं को देश में तब्दील करती है, हाथ की मुट्ठी जोश का रूप देती है। अगर सही दिशा में महसूस करें तो वो आतंकियों का उद्देश्य है, विनाश है, अंत है। भावुक होना हमारी कमजोरी नहीं, हमारी पूंजी है, धरोहर है जिसे संजोना हमारे इंसना बने रहने की निशानी है। हर हफ्ते खुद को एक खत लिखिए, अपने एहसास खुद से बांटिए, अपनी उलझने कम करिए इससे आपको अपने से बाटे करके अपने आप को समझने में मदद मिलेगी।

V- हंसना

किसी ने क्या खूब कहा है, “हंसना रवि की प्रथम किरण सा, कानन के नवजात हिरण सा” हमारा वर्तमान इतना विचित्र है कि अपनी इस सहज, सुलभ विशिष्टता को हमने ओढ़ लिया है। हर आदमी इतना उदास है कि उसे हंसने के लिए लाखों जतन करने पड़ते हैं। हंसने के लिए कोशिश करना, इंसान के लिए बहाने ढूंढ़ने या फिर दिखावे के लिए हंसना हमारे व्यक्तित्व के खोखले पन को उजागर करता है। ईश्वर हर जगह इंसानों को जोर-जोर से हिल-हिलकर हंसने की कोशिश करते देख वाकई हंसता होगा, क्योंकि ईश्वर उदास नहीं है, हम उदास हैं। हम उदास इसलिए हैं कि हमने हर चीज को काम, जिम्मेदारी बना लिया है। हमारी मशीनी दिन चर्या ने हमें  चिड़चिड़ा बना दिया है, हम हंसने की वजह ढूंढ़ते हैं। अगर  जिंदगी को थोड़ा कम गंभीर कर लिया जाए, तो हम इस  अद्भुत्त आश्चर्य  को महसूस कर सकेंगे।

VI- रोना

जब आदमी रोता है, तब सबसे सच्चा होता है। उजला होता है। रोना कायरता की नहीं, खुद का सामना करने की ताकत की निशानी है। दिनकर जी ने लिखा है कि “जिसका पुण्य प्रबल होता है, वही अपने आंसुओं से घुलता है।” हंसी हमें नभ के छोर तक ले जाती है और रोना हमें मन की गुफाओं तक ले जाता है। रोने से मन का आंगन घुल जाता है और हंसने से मन का आसमान खुल जाता है। इससे बड़ा आश्चर्य क्या हो सकता है हमारे होंठ फैलकर किसी भी अजनबी को अपनी दुनिया का हिस्सा बना सकते हैं और हमारी आंख बह कर किसी अजनबी की दुनिया का हिस्सा बन सकती है।

Vll- प्यार करना

लगाव दोस्ती, इश्क, ममत्व, भक्ति हमारी पांच उंगलियां हैं जो जीवन की मुट्ठी को मजबूत करती हैं। द्वारका में सोते हुए श्रीकृष्ण ने राधा का नाम लिया तो रुक्मिणी को ठेस पहुंची। उसने कहा, “उस गांव की लड़की में ऐसा क्या है, जो इतने वैभव के बीच भी आप उसी की सुधि में खोये रहते हैं।” कृष्ण ने कहा, ”आओ, परीक्षा कर लें।” कृष्ण ने अपने लम्बे केश उखाड़ कर उनमें गांठ बांधकर एक तार का पुल यमुना पर बना दिया। यमुना से एक घड़ा भरकर दोनों को दिया कि मेरे प्रेम का स्मरण करते हुए घड़े को उस पार पहुंचा दो। रुक्मिणी ने कृष्ण का स्मरण किया और चलने लगी। घड़ा रास्ते में गिर गया और रुक्मिणी उस पार पहुंच गई। राधा घड़े सहित उस पार पहुंच गई।रुक्मिणी ने राधा से पूछा, “तुमने अपने प्यार में कौनसी चीज जोड़ी जो मैं न कर सकी?” मैं तो गई ही नहीं, प्रिय के हाथों दिया गया घड़ा मुझे ले गया” राधा ने कहा।                                            (अपने आप को कैसे परखें)

किसी कठिनाई और उसके समाधान के बीच उतनी ही दूरी होती है जितनी दूरी हमारे घुटनों और फर्श के बीच होती है। जो अपने घुटने मोड़कर ईश्वर के सामने झुकता है, वो हर मुश्किल का सामना करने की शक्ति पा लेता है। हमारी सोच, हमारा जीवन आश्चर्यों से लबा लब है। विडम्बना यह हैं कि हमारा सुनना, देखना, महसूस करना, स्वैच्छिक है। हम वही देखते हैं, जो देखना चाहते हैं, वही सुनते, महसूस करते हैं जो करना चाहते हैं। ऐसे में अगर आप अपने ज्ञान की इन्द्रियाँ  खोलें तो आप स्वयं के सबसे अच्छे मित्र व पथ प्रदर्शक बन सकते हैं।।

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