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बचपन से दूर होते बच्चे

बचपन से दूर होते बच्चे – कहां गयी मासूमियत ?

ज का दौर उपभोक्तावाद का दौर है और आज दुनिया में हर चीज बिकाऊ है, या हर चीज को प्राप्त करने के लिए छीना-झपटी होती है। जिस चीज की कमी होती है, या जो चीज दुर्लभ हो जाती है, उसे आप या तो बहुत कीमत देकर प्राप्त करते हैं या छीना-झपटी, सीना-जोरी या चोरी से। आज आपको यही बर्ताव मासूमियत के साथ करना पड़ेगा। आपको मासूमियत की या तो बहुत कीमत चुकानी पड़ेगी या ये कहीं से चुरानी पड़ेगी। मासूमियत दुनिया से गायब हो गई है, क्योंकि अब बच्चे भी मासूम नहीं बचे हैं, जो बचे हैं वे जल्दी ही इसे खो देंगे। इस लेख के माध्यम से आज हम जानते हैं कि बचपन से दूर होते बच्चे और  कहां गयी मासूमियत ?

हम बहुत विषाक्त वातावरण में आप कब तक अछूते व निर्दोष बने रह सकते हैं ? हमारे बड़े शहरों में तो यह बिल्कुल असंभव है और जल्दी ही सभी छोटे शहरों व गांवों में मासूमियत विरोधी विषाणु अपना साम्राज्यवाद स्थापित कर देंगे। फिर आपको बहुत कीमत चुका कर ऐसे अछूते-अस्पर्शित स्थानों को खोजना पड़ेगा जहां आप मासूमियत की शुद्ध सांस ले सकें। अपनी चालाकियों और चिंताओं से त्रस्त हो गए अति व्यस्त लोग फिर से बाल सुलभ नैसर्गिकता को खरीदने के लिए किसी रिसोर्ट पर पहुंच जाते हैं, एक सप्ताहांत के लिए 10-20 हजार रुपए चुकाते हैं, फिर बच्चे जैसे होने के लिए तरह-तरह की विधियों से गुजरते हैं। पूरा दिन मासूमियत के लिए अथक प्रयास करते हैं और रात्रि को शराब में अपनी उस मासूमियत को विलीन कर देते हैं। बेचारे ऐसी मासूमियत का क्या करें जो सप्ताहांत की हॉलीडे के बाद वैसे भी नष्ट हो जानी है । आप बुध्द बनने वाले थे और लौट के बुद्दू घर को आये ।  यह मासूमियत कहां खो गई है और कहां मिल सकती है? क्या यह हिमालय में मिल सकती है ?

मासूमियत (Innocence) क्या है ?

 “जब मैं अपनी खुली खिड़की के पास रखी टेबल पर लिखता हूं तो एक नन्ही सी सफेद तितली अपने पंखों की फड़फड़ाहट से मुझे चौंका देती है। शायद, वह मुझे कुदरत की उस शक्ति का एहसास कराना चाहती है जिसे मासूमियत कहते हैं।”  बच्चों के पसंदीदा और कुदरत को करीब से देखने समझने वाले मशहूर लेखक रस्किन बांड का यह अनुभव इंसान की उस खासियत की ओर इशारा करता है जो उसे इंसान बनाए रखती है।

मासूमियत (Innocence) किसी भी इंसानी चेहरे का ऐसा रूप जो इतना सरल हो कि उसे एक बार देखने के बाद वह स्मृति में स्थिर हो जाए और उसे फिर से देखने का मन करे। यह चेहरा किसी बच्चे का, किसी वयस्क का या किसी बूढ़े इंसान का भी हो सकता है। कोई जानवर, परिंदा और फूल-पत्तियां और कुदरत के नजारे भी मासूमियत जगा सकते हैं। मासूमियत इंसान का वह गुण है जो हमारे अंतर्मन में पैदा होकर चेहरे पर झलकता है। यह गुण, दुर्गुण, दोष और अपराध  से परे उस छवि को प्रदर्शित करता है जो इंसान के चेहरे के साथ-साथ उसे मन से खूबसूरत बनाता है।

किसी भी चेहरे की रौनक बढ़ाने वाली मासूमियत इंसानी ज़िंदगी के साथ सफर करती है। एक बच्चे के जन्म लेने, उसके बड़े होने और जीवन के अन्तिम दौर तक वह उसके साथ होती है। कुछ चेहरों में यह खूब उभरती है तो कुछ में कम और कुछ में बिल्कुल नहीं। यह एक नन्हे पौधे की तरह पैदा होती और बढ़ती है जो देखभाल पाकर एक फलदार पेड़ बनता है। बिना देखभाल के जैसे पौधा कुम्हला जाता है, ठीक वैसा ही मासूमियत के साथ होता है। इसे भी साज-संभाल और पोषण की जरूरत होती है।

क्या मासूमियत गुम हो रही है ?

क्या मासूमियत गुम हो रही है? क्या हम ‘गुम मासूमियत’के दौर में जी रहे हैं? किसी से भी पूछे तो एक बारगी वह चौंक जाएगा। कुछ हां कहेंगे, कुछ नहीं और कुछ मिली-जुली प्रतिक्रिया देंगे। पर, यह एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है और इसके पीछे बड़े कारक और कारण जिम्मेदार हैं। यदि मासूमियत को बचपन से जोड़कर देखें और आजकल के बच्चों की ओर देखें तो कई हैरान करने वाली सच्चाइयां जाहिर होती हैं। आजकल मासूमों को जिंदगी की शुरुआत से यही रटाया जाता है कि दूसरों पर भरोसा मत करो। अंजान लोगों को शक की नजर से देखो और समझो कि कोई तुम्हारा फायदा तो नहीं उठा रहा।                                             (बचपन से दूर होते बच्चे – कहां गयी मासूमियत ?)

भावनात्मक या मन के स्तर पर मासूमों के पोषण की स्थिति दुनिया भर में बहुत बुरी है। भारत में हर दूसरा बच्चा वयस्कों की भावनात्मक प्रताड़ना का शिकार है। खास बात यह है कि 83 फीसदी से ज्यादा मामलों में शोषण करने वाले खुद मां-बाप होते हैं। दुनिया के विकसित देशों में तो स्थिति और भी बुरी है। वहां बच्चों के यौन रूप से परिपक्व होने की दर में कई सालों का फर्क आ गया है। बच्चे 10-12 साल में यौन परिपक्व हो रहे हैं। कुछ ऐसे ही हालात हमारे देश के महानगरों में भी बनने लगे हैं। ऐसे में मासूमियत को जगह कहाँ मिलेगी ?

यकीनन एक विज्ञानी अपनी राय बड़े तोल-मोल के साथ देता है क्योंकि वह तथ्यों और शोध पर आधारित होती है। ऐसे में सही लगता है कि जिंदगी से मासूमियत खत्म हो रही है, पर इसी बात पर साइबर राजधानी बेंगलूर की सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल नम्रता शारदा कहती हैं “यह तो समय के साथ होने वाला स्वाभाविक बदलाव है। आईटी क्रांति के दौर में हर सेवा और सुविधा पूरी तरह से बदल रही है। इसके समानान्तर हमारा रहन सहन, आदतें, सोच और समझ में भी नया पन आ रहा है। कुछ चीजों में वह नया पन अच्छा है और कुछ में बुरा। बच्चों के विकास की गति तेज हुई है और उनके लिए दुनिया भर की राहें भी खुली हैं। अब मासूमियत और बचपन के लिए वक्त कम है तो उसे बुराई या नकारात्मक ढंग से नहीं लेना चाहिए। आज के बच्चे बहुत अच्छे हैं और वह बहुत  अच्छे काम भी कर रहे हैं।”

मनोवैज्ञानिक पर वॉटरलू यूनिवर्सिटी की मानव विज्ञानी डॉ. एनी जेलर कहती हैं कि  “मानव के विकास की दर के तेज होने के साथ-साथ सभ्यता के पुराने गुण खत्म हो जाते हैं। जिस तरह इंसानी शरीर से अवशेषी अंग खत्म हो रहे हैं ठीक उसी तरह उसके चेहरे से वह आकर्षण भी खत्म होता जाएगा जो कि उसके पूर्वजों में था। यह जीन स्तर पर हो रहे बदलावों का प्रतिफल और इससे कोई नहीं बच सकता।” दुनियाभर के लगभग सभी महाद्वीपों में बंदरों और वन मानुषों पर अध्ययन कर चुकी डॉ. जेलर के मुताबिक नई पीढ़ी के बच्चों में यह बदलाव तेजी से इसलिए देखने को मिलेगा क्योंकि उनकी मानसिक क्षमता अपने पूर्वजों की तुलना में ज्यादा है।

क्या बच्चों में मासूमियत खत्म हो रही है ?

वाकई मासूमियत खोने का खमियाजा पूरे समाज को चुकाना पड़ रहा है। बचपन में ही बड़े हुए बच्चे जिंदगी भर स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों, तनाव, मानसिक असंतुलन, खराब शैक्षणिक रिकॉर्ड, बिगड़े रिश्तों और आपराधिक छवि वाले वयस्क बनते हैं। हमारे देश में बच्चों की जितनी बुरी स्थिति है उतनी किसी की नहीं। ऐसे में हम उनकी मासूमियत की बात करें तो कैसे? संयुक्त परिवार टूटते जा रहे हैं, गांव वीरान और शहर झुग्गियों से भरते जा रहे हैं और हर कोई सिर्फ पैसे के बारे में सोच रहा है तो मासूमियत और दूसरे जीवन मूल्य बचे तो कैसे? हम ‘कलर्स ऑफ मनी’ के चक्कर में इतनी अति कर रहे हैं कि अपनी भावी पीढ़ी और ‘प्राइम असेट्स’ यानी बच्चों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर रहे हैं। नई सदी में सबका ध्यान केवल अपने पर और पैसे पर है। रिश्ते-नाते आर्थिक जरूरतों के आगे बौने हो गए हैं तो ऐसे में मासूमियत पीछे छूटेगी ही।

आंकड़ों के हवाले से बात करें तो देश की कुल आबादी का 42.7 फीसदी बच्चे हैं पर उनके बारे में कोई नहीं सोचता। सबसे ज्यादा हिंसा का शिकार बच्चे हो रहे हैं। हाल में यूनीसेफ के सहयोग से प्रयास द्वारा किए गए एक सर्वे में पता चला है कि भारत के करीब 53 फीसदी बच्चे शारीरिक, यौन और भावनात्मक शोषण का शिकार हैं। इसके उलट 10वीं पंचवर्षीय योजना में बाल सुरक्षा के नाम पर मात्र 0.034 फीसदी खर्च का प्रावधान है। सरलता से समझें तो एक बच्चे की सुरक्षा के नाम पर मात्र 3 रु. 76 पैसे सरकार खर्च करती है। 11वीं योजना में यह बढ़कर 1 फीसदी हो जाएगा, जो भी ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।

तेजी से गुम होती मासूमियत को सभ्यता के विकास के साथ जोड़कर देखती जयपुर की कामकाजी गृहिणी निशी खण्डेलवाल कहती हैं  “मेरा बेटा 3 साल का और मुझे लगता है कि वह अपने पापा की  पीढ़ी से बहुत आगे है। वह अभी से कम्प्यूटर ऑपरेट करना सीख रहा है, टीवी के चैनल उसे जबानी याद है, वह कारों को देखकर पहचान लेता है और उसके सामान्य ज्ञान का तो कहना क्या! हां, इन सबके बीच वह मासूम हरकतें भी करता है पर पुरानी पीढ़ी से उसका नाप-तौल करना इसलिए ठीक नहीं क्योंकि उसे ‘शार्प माइंड’ और ‘स्मार्ट’  बनाना चाहते हैं। यदि वह ऐसा नहीं करेगा तो अपने साथियों की तुलना में दब्बू और कमजोर रह जाएगा।”

भोपाल में अंग्रेजी की लेक्चरर और एक बच्चे की मां संघ मित्रा अग्निहोत्री मासूमियत में कमी को बदलाव के दौर का प्रतिफल बताती हैं। वे कहती हैं कि “यह सही है आजकल के बच्चे वैसे नहीं रहे जैसे हम थे, पर जमाना भी तो वैसा नहीं रहा। आबो हवा, परवरिश के ढंग के साथ सोच और बच्चों को समझने की समझ सब कुछ बदल गया है। ऐसे बदले माहौल में जब हम वयस्क जीवन मूल्य भूल रहे हैं तो नन्हे बच्चों को बदलने से कैसे रोकें?”                                                              (बचपन से दूर होते बच्चे – कहां गयी मासूमियत ?)

ऐसे में लगता है क्या मासूमियत वाकई खत्म हो गई है? क्या हम उसे लौटा नहीं सकते? बिना इस खूबसूरत गुण के नई सदी के हमारे बच्चे वाकई बच्चे नहीं कहे जा सकते। मासूमियत को फिर से जिंदा किया जा सकता है तो स्नेह और प्रेम के जरिए। अनुशासन का डंडा या महत्वाकांक्षा की लॉलीपॉप किसी बच्चे के चेहरे पर मासूमियत नहीं ला सकती। परिवार सलाहकार डॉ. जे. रिचर्ड के मुताबिक “आजकल के मां-बाप अपने बच्चों को वयस्कों की तरह पालते हैं। 2-4 साल की उम्र में ही नन्हा बच्चा उन्हें जीनियस और सुपीरियर लगने लगता है। ऐसे में जब बच्चा उनकी सिखाई-पढ़ाई पर अपने ढंग से ऐसी असंतुलित प्रतिक्रिया देता है कि वे हैरान रह जाते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि इसके पीछे उन्हीं की महत्वाकांक्षाएं हैं और ऐसा सब करने के लिए उन्होंने ही तो बच्चे को प्रेरित किया था।”                                                            (बचपन से दूर होते बच्चे – कहां गयी मासूमियत ?)

जाहिर सी बात है कि यदि आप बच्चे को कुछ इंच चलने की प्रेरणा देते हैं तो वह कुछ मीटर कदम बढ़ा कर दिखाता है पर यदि आप उन्हें कई मीटर की जगह देकर कुछ इंच चलने की अपेक्षा करें तो इसे आपकी नासमझी कहा जाएगा। गुम मासूमियत के हमारे सवाल पर मशहूर शायर बशीर बद्र के मुंह से अनायास ही निकल पड़ा “खूबसूरत नई दुनिया होगी, उससे अच्छा मेरा बेटा होगा।”  मासूमियत के खत्म होने की बात से अलहदा बद्र साहब कहते हैं कि, ”मुझे नहीं लगता दुनिया से यह कभी खत्म होगी। पढ़ने लिखने और जहीन बनने से मासूमियत के खत्म होने का कोई ताल्लुक नहीं है। मुझे लगता है कि मेरा बेटा तैयब से मासूम और जहीन कोई नहीं और यकीनन यही हर मां-बाप की भी सोच होगी। मैं अपने दोस्तों-रिश्तेदारों के बच्चों को देखता हूं तो मुझे लगता है कि उनकी और मेरी मासूमियत में फर्क है तो सिर्फ वक्त का। लोग कहते हैं कि टीवी-कम्प्यूटर ने बच्चों को बिगाड़ दिया है और उनकी मासूमियत छीन ली है तो मैं ऐसे लोगों से पूछता हूं कि आपने उन्हें बिगड़ने का माहौल ही क्यों दिया?”

टीवी-कम्प्यूटर के फायदे भी हैं और नुकसान भी और यह लाड़-दुलार की हर चीज के साथ लाज़मी है। ऐसे में कोई बच्चा बिगड़ा नहीं होता। हर बच्चा मासूम होता है और हर इंसान भी। बस, जरूरत है तो उस मासूमियत को समझकर बढ़ाने और बचाने की।’ यकीनन किसी देश और समाज की पहचान उसकी भावी पीढ़ी से होती है जो कि बच्चे होते हैं। मां-बाप के पास बच्चों के लिए वक्त नहीं है। उनकी अति महत्वाकांक्षाओं और व्यस्तताओं ने उनके अच्छे गुणों के साथ बच्चों की मासूमियत को भी निगल लिया है। बच्चों को बच्चा न समझ वयस्कों के समान समझने की सोच और सीखों ने पूरे सामाजिक ताने-बाने के साथ जीन स्तर तक परिवर्तन ला दिए हैं।

बच्चों के पास मासूम बचपन और बड़ों के पास अच्छे जीवन मूल्य नहीं बचेंगे तो इंसान और इंसानियत के क्या मायने? जब इंसानियत की पहचान ही गुम हो जाएगी तो एक रोबोट और आदमी में कुछ ज्यादा फर्क नहीं रहेगा। ऐसा हो रहा है और इस बदलाव की गति दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। आत्मा पर चोट करते और तन-मन को असमय थकाते इन बदलावों के बीच मासूमियत को बचाए रखना ही जिंदगी को जीतना है।                                           (बचपन से दूर होते बच्चे – कहां गयी मासूमियत ?)

निश्चित तौर पर शौरमंडल  के एकमात्र आबाद ग्रह धरती पर बच्चों से ज्यादा मासूम दूसरा कोई नहीं। मासूमियत बच्चों के चेहरों की रौनक है। इससे अच्छी कोई दूसरी कोशिश नहीं हो सकती कि सभ्य समाज इसे बचाने के और बढ़ाने के जतन करे। एक मुस्कान और जरा-सी तारीफ पाकर कोई भी बच्चा चहक उठता है, खिल उठता है और पूरे माहौल को मासूमियत से सराबोर कर देता है। कहना होगा कि वह तो अपना काम कर रहा है पर हम बड़े अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं ।।

कुदरत की मासूमियत को कैसे महसूस करें

यहाँ हम कुछ कुदरती मासमूयित के उद्दाहरण दे रहे हैं, जिन्हे देखकर आप कुदरती मासूमियत को नजदीक से समझ सकते हैं :-

जानवरों को देखकर –

किसी मासूम जानवरों को देख बर बस ही मासूमियत उभर आती है। अपने बच्चों को दुलारते, मुश्किल में फंसे या कोई मासूम हरकत करते जानवर को देख कोई भी पत्थर दिल मन भी पिघल सकता है। तर्क शक्ति से रहित जानवर कुदरत की मासूम देन होते हैं ।

किसी बच्चे को देखकर

किसी नन्हे बच्चे के भोले से मुस्कुराते चेहरे को देख कोई भी उसकी मासूमियत को साझा कर सकता है। एक नवजात की किलकारी, उसके स्पर्श से, घुटने चलते बच्चे का बढ़ कर पैरों को पकड़ लेना, अपने पैरों को जमाते बच्चे का तोतली जुबान में आपसे बातें करना ऐसी ही कुछ क्रियाएं हैं जो आपको मासूमियत से भर जाती हैं।

फूलों को देखकर

खूबसूरत फूलों को देखकर, उन्हें छूकर या उनकी खुशबू को महसूस कर मन खुश हो जाता है। मन में एक मासूम सी अनुभूति आती है। फूल माहौल को खुशगवार बना देते हैं। भावनाओं और खुशी की मासूमियत के साथ प्रदर्शित करने के लिए कोमल फूलों से बेहतर कोई दूसरा नहीं।

किसी  घटना याद करके

अक्सर अकेले में या अपनों के बीच कुछ ऐसा घट जाता है जो आपको सालों बाद भी एक खुश नुमा याद के रूप में अच्छा लगता है। मुश्किल के समय किसी को मदद या किसी से मिली मदद, किसी प्रियजन के साथ बिताया अच्छा समय या ऐसा ही कोई वाकया चेहरे पर उसकी याद के साथ मासूम रौनक ले आता है।

किसी कुदरती नजारे से

कोई आकर्षक और खूबसूरत कुदरती नजारा मन में अपार शांति और ऊर्जा भरने के साथ-साथ मासूमियत का भाव भर देते हैं। बहती नदी, पहाड़, हरी-भरी वादियां, जंगल और हरियाली के दृश्य किसी भी तनाव ग्रस्त मन को शांत और मासूम बना सकते हैं।                      (बचपन से दूर होते बच्चे – कहां गयी मासूमियत ?)

परिदों से

असीम आसमान में बिना कोई बंधन और सीमाओं के उड़ते मासूम परिदे भी मासूमियत जगाते हैं। बच्चों को जन्म देने के लिए हजारों किलोमीटर की उड़ान भरते परिंदे मासूमियत के फरिश्ते होते हैं। अपने अनुशासन और कर्मशीलता के साथ सच्ची सामुदायिक भावना से जीने वाले खूबसूरत परिंदे वाकई बच्चों की तरह मासूम होते हैं।

अचानक ही

आपके मन में मासूमियत जगे इसके लिए कोई विशेष समय, मौका या साधनों की जरूरत नहीं होती, क्योंकि वह अचानक भी जग सकती है। आप किसी अनजाने आदमी से मिलें, आपने कोई खास घटना कहीं पढ़ी, देखी या सुनी और अचानक ही मन द्रवित हो जाए तो समझिए कि इसके पीछे आपके मासूम मन की प्रतिक्रिया है।

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