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सच कैसे बोलें

सच कैसे बोलें – क्या हमें हमेशा सच बोलना चाहिए ?

सच का हर क्षण अपने आप में सुंदर है। यह ईश्वर की तरह पारलौकिक, अनंत, संपूर्ण और व्याप्त है। इसलिए जो कुछ कहो सच कहो, लेकिन सीधे नहीं परोक्ष सत्य के उद्देश्य में तथ्य की स्पष्टता रखो न कि आहत करने की संभावना। चूंकि मानव की समझ सीमित है, इसलिए सच सीधे न होकर सरल और दूसरे तरीके से कहा जाना चाहिए। दरअसल इसका कारण सत्य की श्रेष्ठतम और अद्भुत चमक है जो मनुष्य के अस्थिर आनंद के लिए कुछ ज्यादा ही चमकीली है। सत्य मानव व्यावहारिक जीवन से कहीं श्रेष्ठ और दिव्य है। शुद्ध रूप में कहें तो सत्य की चमक चौंधिया देने वाली होती है, इसलिए उसे प्रत्यक्ष देख पाना साधारण मनुष्य के लिए बहुत जटिल है। जबकि यही सत्य अप्रत्यक्ष रूप से कहा जाए तो वह उसके लिए सहज बन जाता है। आगे हम विश्लेषण करते हैं कि सच कैसे बोलें – क्या हमें हमेशा सच बोलना चाहिए ?

सत्य की अभिव्यक्ति

सत्य की अभिव्यक्ति जितनी सरल होगी उसे ग्रहण कर पाना व्यक्ति के लिए उतना ही आसान होगा। उदाहरण के लिए जैसे बिजली के बारे में जानकारी लेने की बालकों की जिज्ञासा को प्रत्यक्ष अनुभव या कोई सीधी परिभाषा देकर शांत नहीं किया जा सकता। ऐसा करना अव्यवहारिक होगा। इसकी बजाय उन्हें छोटे-छोटे उदाहरणों से समझाना आसान है। सत्य को भी  इसी प्रकार व्यक्त करो। अचानक एकदम नहीं बल्कि इसे धीरे-धीरे प्रकट करो अन्यथा इसकी तीव्र रोशनी व्यक्ति को अंधा कर सकती है। सत्य कहते समय अन्य सावधानियां भी रखो, जैसे महत्वहीन तथ्यों को छांटकर मात्र उसके महत्वपूर्ण और सुनहरे कणों को खोजना या कहना मत भूलो। सुझाव देने के लिए सत्य का उपयोग करना अनुचित है। इसके अलावा समय या परिस्थिति के अनुसार इसकी मूल अवधारणा को परिवर्तित करने का निरर्थक प्रयास भी मत करो क्योंकि सत्य का काम सुझाव देना नहीं और न ही इसमें विचारों की तरह अस्थिरता का गुण है। जैसा कि विचारों में होता है, वे स्थिर नहीं रहते और हर पल बदलते रहते हैं। जबकि सच सूर्य से भी अधिक प्राचीन है।

सत्य और ईश्वर में समानता

दरअसल सत्य ईश्वर के जितना ही पुराना है। जब से ईश्वर है तभी से सत्य है 12सत्य में वे सारे गुण मौजूद हैं, जो ईश्वर में होते हैं और वह तब तक चिरस्थाई रहेगा जब तक ईश्वर है। यह सहपारलौकिक अस्तित्व है। ईश्वर कभी भी सीमित नहीं रहा और वह नष्ट भी नहीं हो सकता। ठीक उसी प्रकार सत्य भी कभी नष्ट नहीं हो सकता। वह किसी व्यक्ति या शरीर के समाप्त हो जाने पर उसके साथ नहीं मरता। जैसे ईश्वर मानव की समस्त क्षमताओं से परे और प्रभावहीन बना रहता है। उसी तरह सत्य निरपेक्ष, सुनिश्चित और परिशुद्ध है। न ही समय और न ही मनुष्य उसमें हेर-फेर कर सकता है। वह संसार और ब्रह्मांड से कहीं ऊपर है। यह शाश्वत और देवतुल्य है।                   सच कैसे बोलें – क्या हमें हमेशा सच बोलना चाहिए ?

सत्य और व्यवहार

व्यवहार और सत्य में यही अंतर है कि व्यवहार मनुष्य द्वारा प्रभावित रहता है, जबकि सत्य इससे अप्रभावित रहता है। सच को सुंदर या प्रिय बना पाना मानव योग्यता से परे है, क्योंकि यह स्वयं ही बहुत सुंदर है। व्यवहार वह है, जिसके बारे में मानव सोचता, महसूस या विश्वास नहीं करता बल्कि मात्र उसे सम्पन्न करने का कार्य करता है। जबकि सत्य को व्यक्त करने के लिए इन सभी की आवश्यकता पड़ती है। सत्य दुर्लभ है और इसे कहना आनंदित कर देने वाला अनुभव होता है।

सच कड़वा  होता है

 हर उनवान की अपनी एक अदा होती है, एक अलग अंदाज होता है, उसका अपना एक तेवर होता है और उसकी अपनी एक अपनी खास जबान होती है। जब कोई भी उनवान, ख्यालों की दुनिया को जबान देता है तो ज़िंदगी के मुखतलिफ रंग कागज पर उतर आते हैं, पढ़ने और सुनने वालों के जेहन के दरीचों में उस उनवान के ख्यालात का जादू बिखरने लगता है, और वो उनवान । ज़िंदगी के सारे कोनों की सच्चाई अपने ढंग से पेश करने लगता है। आज का उनवान है, सच, इस पूरे माहौल का, इस पूरे समाज का हर इंसान के दिमाग का सच।

सच ने सदियों से इस सारी कायनात पर अपना सिक्का जमा रखा है, सच तो ये है कि सच का ही हर तरफ बोल बाला है। मगर ये भी सच है कि इसी सच ने सुकरात को जहर प्याला भी पिलवा दिया और ईसा को सूली पर भी चढ़वा दिया। सच बहुत कड़वा भी होता है, सच को बर्दाश्त करना, हर इंसान के बस की । बात भी नहीं है। सच को बोलने के लिए बहुत हौसले की भी जरूरत होती है। हर दौर के कलम कार ने अपने जमाने की सच्चाई को कहने की कोशिश की है, जमाना जैसा चाहे समझे- दीप्ति मिश्र कहती है सच को मैंने सच कहा, हां कह दिया तो कह दिया, ये जमाने की नजर में, ग़र हिमाकत है तो है। सच बोलने के लिए बहुत तकलीफें सहनी पड़ती है, मगर अपने दिल की बात को हर हाल में कहने की कोशिश करनी चाहिए, रोने-धोने से क्या हासिल होने वाला है, जो कहना है डंके की चोट पर कहें- दुष्यंत कुमार ने कहा,  “हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं  लोग रो-रो के बात कहने की आदत नहीं रही।”

झूठ का बोल बाला –

कभी-कभी तो लगता सच बात करना भी एक गलती हो रही है। जिधर नजर फैलाइए झूठ के भौंपू हिट दिखाई देते हैं। सच नीचे जमीन पर खड़ा हुआ, ऊपर वलंदी पर बैठे हुए झूठ की तरफ कितनी हसरत भरी निगाहों से तक रहा है। बौना झूठ, कदावर सच की तरह हिकारत भरी नज़रों से देख रहा है, क्या ये ही है आज का सच और आज के सच की हालत, जब वो कहने पर मजबूर है- एक मशहूर शायर ने लिखा झूठ वाले कहां के कहां बढ़ गए और मैं था कि सच बोलता रह गया।                            सच कैसे बोलें – क्या हमें हमेशा सच बोलना चाहिए ?

सच तो ये है कि हम अभी तक भी शायद सच को पूरी तरह समझ ही नहीं पाए। आदमी कितनी सफाई से झूठ बोलकर सच को तार-तार कर देता है हमें पता ही नहीं चल पाता। झूठ पर सच का ऐसा मुलम्मा चढ़ाकर पेश किया जाता है कि हमारे लिए सच और झूठ का फैसला कर पाना ही मुश्किल हो जाता है। जब आदमी अपनी वादा खिलाफी, मक्कारी और ज़िंदगी की बेवफाई को झूठ के दामन में लपेट कर औरत के सामने रखता है तो मजबूर होकर उसके झूठ के सामने वह सच में हार जाती है- परवीन शाकिर की कलम से उभरा ये शेर “मैं सच कहूंगी मगर फिर भी हार जाऊंगी, वो झूठ बोलेगा और लाजवाब कर देगा।”

सच कि मजबूरी

क्या कभी झूठ के आकाओं ने, रोटियों पर तकरीर करने वालों ने कभी सच में सोचा है कि इन झूठी तकरीरों से किसी का पेट नहीं भरने वाला है। आदम और हव्वा से लेकर आज तक इस पूरी कायनात का सच है, भूख “सच तो ये है कि भूख लगती है रोटियों का जुगाड़ कर प्यारे।” जैसे-जैसे हम बड़े होते गए, बस झूठ बोलने में खरे होते गए। सच को हम सच में भूलते गए। अब भी वक्त है, सच को समझने का, वरना तो फिर सच में सच नहीं रहेगा। आपको ही सोचना है, आपको ही समझना है- एक शायर की जबानी “आखिरी फैसला आपके हाथ है सच ने तलवार के आगे सर रख दिया।”  नूर लखनवी ने भी ये फरमाया है – “चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो आईना झूठ बोलता ही नहीं ।”

 महिलाएं सबसे ज्यादा झूठ बोलती हैं ?

इस दुनिया में कोई भी ऐसा इंसान  नहीं है जो झूठ न बोलता हो। मैं मानता हूं कि झूठ बोलने के मामले में सबसे आगे महिलाएं हैं। वही सबसे ज्यादा झूठ बोलती हैं और छोटी-छोटी बातों तक में झूठ बोल जाती हैं। चूँकि  झूठ सामाजिक और परिवारिक भय से पैदा होता है और यह भय महिलाओं को सबसे अधिक सताता है जिस कारण वे झूठ बोलती हैं। वे अपने हर भय को छिपाने के लिए झूठ बोल जाती हैं। एक कारण यह भी है कि महिलाएं अपनी इमेज को लेकर बेहद सतर्क रहती हैं इसलिए कई बार परिवार व समाज में इमेज खराब न हो इसलिए भी झूठ बोल जाती हैं।                                                                           सच कैसे बोलें – क्या हमें हमेशा सच बोलना चाहिए ?

कई बार महिलाओं को पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते दर्द सहना पड़ता है और त्याग करना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर अगर कोई औरत बीमार हो और घर का कोई व्यक्ति उससे पूछे कि तुम कैसी हो? तो वह कभी यह नहीं बताएगी कि उसकी तबीयत खराब है। वह दर्द व तकलीफें सहती रहेगी और अपने घरेलू काम करती रहेगी। औरत के अंदर अपने परिवार की जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए त्याग की भावना प्रबल होती है। और इन्हीं जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए वह दर्द सहती है और झूठ बोल जाती है।

औरत अपने व्यक्तिगत दुखों को इसलिए आसानी से छिपा ले जाती है ताकि परिवार में संतुलन बना रहे। वैसे भी औरत का इतना कुछ निजी होता है जिसे वह बाहर नहीं बताना चाहती। बात मजाक में न ली जाए तो स्त्री का मेकअप उसका सबसे बड़ा झूठ है। चूंकि वह असलियत छिपाता है। जब तक मजबूरी न हो कोई भी स्त्री अपने प्यार की बात स्वीकार नहीं करती। इसलिए मुझे लगता है कि झूठ और सच के सारे विभाजन पुनःपरीक्षण चाहते हैं। संसार का कोई व्यवसाय झूठ के बिना नहीं चलता चूंकि वस्तु की खरीदने वाली कीमत दूसरी होती है और बेचने वाली दूसरी। जिसे हम शिष्टाचार और संस्कृति कहते हैं वह धुले पुछे झूठ का ही नमूना है। जहां हम बहुत सी ऐसी स्थितियों, व्यक्तियों और संबंधों में नपातुला शिष्ट व्यवहार करते हैं जो असलियत में वह होता ही नहीं है।

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